Saturday, January 14, 2012

एहतराम इस्लाम की ग़ज़लें

कवि /शायर -एहतराम इस्लाम 
सम्पर्क -09839814279
एहतराम इस्लाम की ग़ज़लें
एक 
हर एक की नज़र से बचा ले गया उसे 
था कितना बा- कमाल उड़ा ले गया उसे .

पहले तो करके मेरे हवाले गया उसे 
फिर वक्त खुद ही मुझसे छुड़ा ले गया उसे .

तूफ़ान ही से खतरा सफीने को था मगर 
तूफ़ान ही किनारे बहा ले गया उसे .

था तो लहकता जख्म तमन्ना का ,पर कोई 
मुस्कान के कवच में छिपा ले गया उसे .

चट्टान अपने दर से तो क्या हिलती एहतराम 
लहरों का जोर था जो बहा ले गया उसे .
दो 
आँखों में भड़कती हैं आक्रोश की ज्वालाएँ 
हम लाँघ गये शायद संतोष की सीमाएँ .

पग -पग पे प्रतिष्ठित हैं पथ -भ्रष्ट दुराचारी 
इस नक्शे में हम खुद को किस बिन्दु पे दर्शाएँ .

अनुभूति की दुनिया में भूकम्प सा आया है 
आधार न खो बैठें निष्ठाएँ -प्रतिष्ठाएँ ..

बासों का घना जंगल कुछ काम न आएगा 
हाँ !खेल दिखा देंगी कुछ अग्नि शलाकाएँ .

सीनों से धुआं उठना कब बन्द हुआ कहिए 
कहने को बदलती ही रहती हैं व्यवस्थाएँ .

वीरानी बिछा दी है मौसम के बुढ़ापे ने 
कुछ गुल न खिला डालें यौवन की निराशाएँ .

तस्वीर दिखानी है भारत की तो दिखला दी 
कुछ तैरती पतवारें कुछ डूबती नौकाएँ .
तीन 
क्या फ़िक्र कि अँधियारा अजय भी तो नहीं है 
फिर ,सूर्य के उगने का समय भी तो नहीं है 

संघर्ष बिना प्राप्त सफलता पे न इतराओ ,
यारो !ये विजय कोई विजय भी तो नहीं है .

मैं अपना अहं तोड़ के रख दूँ प तुम्हारा 
हो जायेगा मन साफ़ ये तय भी तो नहीं है .

वैभिन्य दिशाओं का भला कैसे मिटेगा 
सम्भाव्य विचारों का विलय भी तो नहीं है .

क्यों पाप छिपा लेने का अपराध करूं मैं 
मुझको किसी भगवान का भय भी तो नहीं है .
[एहतराम इस्लाम हिन्दी और उर्दू के महत्वपूर्ण कवि /गज़लकार हैं -है तो है इनका महत्वपूर्ण गज़ल संग्रह है |वर्तमान में एहतराम इस्लाम इलाहाबाद प्रगतिशील लेखक संघ के अध्यक्ष भी हैं |इनका पूरा परिचय इसी ब्लॉग में उपलब्ध है ]

7 comments:

  1. आठ जनवरी की सांझ मेरे व्यक्तिगत समय-भाल पर दिठौना बनी कुछ अलग ही महत्त्व रखती है मेरी ज़िन्दग़ी में. वर्धा विश्वविद्यालय, प्रयाग के सभागार में ’नवोन्मेष’ के काव्य-समारोह में एहतराम साहब से मिलना और.. और बस, लगातार अभिभूत होता चला गया. एहतराम साहब के शिष्ट-संयत व्यक्तित्त्व पर शोभती मधुर-मोहक मुस्कुराहट. किन्तु, ग़ज़ल कहते वक़्त निस्सृत तीर से सीधे चलते या सही कहें तो तेज़ाबी शब्द !

    तुषार भाईजी, आपने एहतराम साहब की बहुत ही उम्दा ग़ज़लें पेश की हैं. कहना न होगा, तीनों ग़ज़लें मेरे लिये ’पाठ’ हैं.

    प्रस्तुत तीन अश’आर हृदय की गहराइयों में बस गये -

    सीनों से धुआं उठना कब बन्द हुआ कहिए
    कहने को बदलती ही रहती हैं व्यवस्थाएँ .

    क्या फ़िक्र कि अँधियारा अजय भी तो नहीं है
    फिर ,सूर्य के उगने का समय भी तो नहीं है.

    मैं अपना अहं तोड़ के रख दूँ प तुम्हारा
    हो जायेगा मन साफ़ ये तय भी तो नहीं है .

    एहतराम साहब को मेरी सादर शुभकामनाएँ संप्रेषित कर देंगे, इस आशा के साथ आपका हार्दिक अभिनन्दन.

    --सौरभ पाण्डेय, नैनी, इलाहाबाद (उप्र)

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  2. बहुत ही अर्थपूर्ण रचना।

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  3. तूफ़ान ही से खतरा सफीने को था मगर
    तूफ़ान ही किनारे बहा ले गया उसे .

    पग -पग पे प्रतिष्ठित हैं पथ -भ्रष्ट दुराचारी
    इस नक्शे में हम खुद को किस बिन्दु पे दर्शाएँ .


    मैं अपना अहं तोड़ के रख दूँ प तुम्हारा
    हो जायेगा मन साफ़ ये तय भी तो नहीं है .

    ज़िंदाबाद ज़िंदाबाद ज़िंदाबाद

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  4. तूफ़ान ही से खतरा सफीने को था मगर
    तूफ़ान ही किनारे बहा ले गया उसे .

    था तो लहकता जख्म तमन्ना का ,पर कोई
    मुस्कान के कवच में छिपा ले गया उसे ............BAHUT HI SARTHAK ..BEST RACHNA .
    TUSHAR JI SABHI POST BEHTARIN .BADHAI

    AAPKO MAKARSANKRANTI KI HARDIK BADHAI .

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  5. ehatram ji ki ek se badhkar ek ghazal padhi aapka aabhar padhvaane ke liye.

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  6. पहले तो करके मेरे हवाले गया उसे
    फिर वक्त खुद ही मुझसे छुड़ा ले गया उसे .very nice.

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  7. संघर्ष बिना प्राप्त सफलता पे न इतराओ ,
    यारो !ये विजय कोई विजय भी तो नहीं है .

    बिल्कुल सटीक बयानी है

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