Wednesday, August 31, 2011

मेरी एक गज़ल

चित्र -गूगल सर्च इंजन से साभार 
चल के काँटों में लिखें आज कोई ताज़ा गज़ल

हमसफ़र है वो ,मगर दोस्त के किरदार में है 
पर ज़माने को यकीं है वो मेरे प्यार में है 

चल के काँटों में लिखें आज कोई ताज़ा गज़ल 
फूल का ज़िक्र तो मेरे सभी अशआर में है 

उससे मैं किस तरह अपने गम -ए -हालात कहूँ 
आज वो खुश है बहुत दावत -ए -इफ़्तार में है 

डूबना है तो चलो गहरे समन्दर में चलें 
देख लें हौसला कितना मेरी पतवार में है 

ऐ हरे पेड़ जरा सीख ले झुकने का हुनर 
आज तूफान बहुत तेज है ,रफ़्तार में है 

मेरी मुश्किल है नहीं वक्त के साँचे में ढला 
ढल के पत्थर जो खिलौना हुआ बाज़ार में है 

बाढ़ में बर्फ़ सा गल जायेगा ये तेरा मंका 
सिर्फ़ चूने का ही पत्थर दर -ओ -दीवार में है 
चित्र -गूगल से साभार 

Tuesday, August 23, 2011

मेरी एक-गज़ल

चित्र -गूगल से साभार 
परिन्दे तैरते हैं जो, नदी -झीलों में होते हैं 
कहाँ बादल के टुकड़े रेत के टीलों में होते हैं 

सफ़र में दूरियां अब तो सिमट जाती हैं लम्हों में 
दिलों के फासले लेकिन कई मीलों में होते हैं 

जरा सा वक्त है बैठो मेरे अशआर तो सुन लो 
मोहब्बत के फ़साने तो कई रीलों में होते हैं 

ये गमले, बोनसाई छोड़कर आओ तो दिखलायें 
कमल के फूल कितने रंग के झीलों में होते हैं 

शहर से दूर लम्बी छुट्टियों के बीच तनहा हम 
हरे पेड़ों ,तितलियों और अबाबीलों में होते हैं 

हम इक  मजदूर हैं प्यासे ,हमें पानी नहीं मिलता 
हमारी प्यास के चर्चे तो तहसीलों में होते हैं 

कहानी में ही बस राजा गरीबों से मिला करते  
हकीकत में तो केवल राम ही भीलों में होते है 

खण्डहरों का भी एक माज़ी  इन्हें नफ़रत से मत देखो
तिलस्मी तख़्त -सिंहासन इन्ही टीलों में होते हैं  
चित्र -गूगल से साभार 

Sunday, August 21, 2011

आस्था का गीत -सन्दर्भ- कृष्ण जन्माष्टमी

चित्र -गूगल से साभार 
बाँसुरी बजाने दो -एक गीत सन्दर्भ- कृष्ण जन्माष्टमी 
सधे हुए 
होठों को 
बाँसुरी बजाने दो |
मोरपंख 
रत्नजड़ित 
मुकुट पे सजाने दो |

जीवन भर 
विष पीकर 
मीरा ने पद गाये ,
जन्मों के 
अन्धे हम 
सूरदास कहलाये ,
उभर रहीं 
मन में जो
छवियाँ ,वो आने दो |

द्वापर में 
कृष्ण हुए 
त्रेता में राम हुए ,
सीता के 
संग कभी ,
राधा के नाम हुए ,
हे भटके मन 
मुझको 
वृन्दावन जाने दो |

तुम तो
हो निराकार  
सृष्टि का सृजन तुमसे ,
ऋषियों का 
योग- ज्ञान 
प्रेम का मिलन तुमसे ,
मुझको भी 
प्रेम और 
भक्ति के खजाने दो |

हे प्रभु तुम 
कालपुरुष !
और हम खिलौने हैं ,
हम तेरे 
मस्तक पर 
सिर्फ़ एक दिठौने हैं ,
श्रद्धा के 
फूलों से 
जन्मदिन मनाने दो |
चित्र -गूगल सर्च इंजन से साभार 

Friday, August 19, 2011

मेरे दो गीत

चित्र -गूगल से साभार 
एक 
हाथों में हाथ लिए दूर तलक जाता है 
बारिश में  
छत होता 
तेज धूप ,छाता है |
हाथों में 
हाथ लिए 
दूर तलक जाता है |

मीत मेरा 
फूलों की खुशबू है 
दरपन है ,
जीवन की 
खुली हुई डायरी 
घर -आंगन है ,
जीत -हार 
दोनों में 
कौड़ियाँ बिछाता है |

जब -जब 
सम्बन्धों की 
डोर कहीं टूटे ,
साथ -साथ 
चले कोई 
और साथ छूटे ,
ऐसे में 
आँखों को 
स्वप्न से सजाता है |

कुट्टी हो 
तब मिलता 
झील के किनारे ,
गुस्से में 
पानी में 
कंकरिया मारे ,
फिर भी 
हम डूबें तो 
तैरकर बचाता है |
दो 
टूटी हुई छतों की पीड़ा 
अपनी इच्छा से 
से ये बादल 
सौ -सौ धार बरसते हैं |
टूटी हुई 
छतों की पीड़ा 
मौसम कहाँ समझते हैं |

सावन -भादों में 
भी रहते कितने 
पर्वत प्यासे ,
हरी -भरी 
घाटी को देखें 
परती -चौमासे ,
सबकी बात 
कहाँ सुनते ये 
काले मेघ घुड़कते हैं |

मन खजुराहो 
देह अजंता 
मौसम आग लगाये ,
देह तोड़ती 
पुरवा मन में 
सौ -सौ राग जगाये ,
इन्द्रधनुष में 
खोकर हम भी 
कितने गीत सिरजते हैं |

भरे ताल में 
कँवल -कँवल पे 
भौरों की मनमानी ,
मेहंदी रची 
हथेली लेकर 
खिली रात की रानी ,
यादों की 
जमीन पर खिलकर 
कितने फूल  महकते हैं |

चित्र -गूगल से साभार 

Wednesday, August 17, 2011

एक कविता -राजघाट पर राजव्यवस्था

महान जननायक -अन्ना हजारे 
राजघाट पर राजव्यवस्था
जिनका है 
ईमान हुए वो 
बन्दी कारागारों में | 
भ्रष्टाचारी 
पूजनीय हैं   
राजा के दरबारों  में |

अर्धरात्रि को 
मिली हमें ये आज़ादी 
कब भोर हुई ,
राजघाट पर 
राजव्यवस्था कैसे 
आदमखोर हुई ,
एक नहीं अब 
कई शकुनि हैं 
सत्ता के गलियारों में |

तानाशाही 
झुक जाती जब 
जनता आगे आती है ,
हथकड़ियों 
जेलों से कोई 
क्रांति कहाँ रुक पाती है ,
कहाँ अहिंसा से 
लड़ने की 
हिम्मत है तलवारों में |

फिर तिलस्म 
तोड़ेगा कोई 
हातिमताई आयेगा ,
अन्ना का 
यह अनशन निश्चित 
भ्रष्टाचार मिटाएगा ,
एक दिया भी 
जला अगर तो 
भय होगा अंधियारों में |
[यह कविता महान जननायक अन्ना हजारे को समर्पित ]

Tuesday, August 16, 2011

एक प्रेम गीत -मौसम तेरी हँसी चुराता

चित्र -गूगल से साभार 
एक गीत मौसम तेरी हंसी चुराता 
मौसम तेरी 
हँसी चुराता 
हँसते धानों में |
तुम्हीं महकती हो 
फूलों की इन 
मुस्कानों में |

सूने घर की 
पृष्ठभूमि में जाने 
कितने रंग सजाती ,
उत्सव के दिन 
घूँघट में तुम 
सबसे पहले मंगल गाती |
खिल जाते हैं 
रंग तुम्हीं से 
माँ के पानों में |

हरियाली के 
सपने लेकर 
मेघ गगन में छाये होंगे ,
मेंहदी और 
महावर वाले दिन 
तुमसे ही आये होंगे |
तेरी लौ से 
जल उठते हैं 
दिये मकानों में |

भूखे -प्यासे 
थके सफर से 
हम जब घर आते ,
तेरे होंठों पर 
खुशियों के 
इन्द्रधनुष छाते ,
पंछी बनकर 
उड़ती 
मेरे साथ उड़ानों में |

चित्र -गूगल से साभार 

Monday, August 15, 2011

एक गीत -हे बापू हमें क्षमा करना

चित्र -गूगल सर्च इंजन से साभार 
हे बापू हमें क्षमा करना 
हे बापू हमें क्षमा करना 
हम भूल गए पन्द्रह अगस्त |
तुमने तो इसे बुलंदी दी 
हो गया हमीं से अस्त -व्यस्त |

रंगे कोयले के रंगों में 
उजले -धुले वस्त्र खादी के ,
लाल किले से झूठे भाषण 
मुखिया पढ़ता आज़ादी के ,
महंगाई ,भ्रष्टाचार ,निकम्मे 
शासन से हौसले पस्त |

अब जागरूक जनता को भी 
नेता असत्य समझाते हैं ,
संसद में जाकर सोते हैं 
ये जन गण मन कब गाते हैं ,
हो गया देश यह हवनकुंड 
लेकिन दिल्ली है मस्त -मस्त |

हे राष्ट्रपिता क्या आज़ादी की 
यह तस्वीर तुम्हारी है ?
टू जी थ्री जी सब पचा गए 
अब अगले की तैयारी है |
उन वीर शहीदों के सपने 
सब मंसूबे हो गए ध्वस्त |

वैभव ,वीरों से भरे हुए हम 
इतना क्यों असहाय हुए ,
अब तो अपना है संविधान 
फिर इतना क्यों निरुपाय हुए 
सो गए पहरुए जनता के 
बस कागज पर लग रही गश्त |
चित्र -गूगल से साभार 

Sunday, August 14, 2011

एक गीत -वह देश हमारा है

चित्र -गूगल से साभार 

जिस देश के आकाश में 
फहराये          तिरंगा |
शंकर की जटा से है 
निकलती जहाँ  गंगा |
                वह देश हमारा है |
                वह देश हमारा है |

होती जहां  शाम को 
परियों की कथाएं ,
फूलों से जहां रोज 
महकती हैं दिशाएं ,
             ऋषियों के महाज्ञान का 
             जो देश पिटारा हैं |

रग -रग में जहां होली 
कण -कण में दीवाली 
होती है जहां ईद की भी 
शान निराली ,
               क्रिसमस के खिलौनों से 
               जिसे रब ने संवारा है |

मौसम के इशारे पे 
जहां गीत बदलते ,
भगवान भी जिस देश में 
वंशी ले मचलते ,
             जिस देश के पांवों तले 
             सागर का किनारा है |

जिस देश ने दुनियां को 
दिया शांति के माने 
जिस देश ने गाया है 
अहिंसा के ही गाने ,
              बापू ने जिसे खून -
              पसीने से संवारा है |
              
चित्र -गूगल से साभार 
              

Friday, August 12, 2011

मेरी दो ग़ज़लें

चित्र -गूगल से साभार 
एक
सूखे में कहीं ,बाढ़ में फसलें थी धान की 
फिर भी अमीन लाए हैं नोटिस लगान की 

पत्रा में लग्न खूब थे पंडित भी कम न थे 
फिर भी कुँवारी रह गयी बेटी किसान की 

बच्चों की दौड़ कम हुई आंगन की मेड़ से 
शहतीरें बाँट दी गयीं गिरते मकान की 

बेरोजगार बेटे की आवाज़ मर गयी 
सपने जला रही है, बहू खानदान की 
दो 
सितारा हो बुलंदी पर तो ये जागीर देता है 
ये गर्दिश में शहंशाहों को भी जंजीर देता है 

फिज़ा में रंग कितने हैं वो कैसे जान पायेगा 
खुद उसका आइना उसको गलत तस्वीर देता है 

जो सब्जी काटता है और किचन में काम आता है 
वही चाकू उँगलियों को भी अक्सर चीर देता है 

वो सबके सामने उजले कबूतर भी उड़ाता है 
मगर चुपके से बाजों को नुकीले तीर देता है 

हमारे मुल्क में पिंजरे में तोता राम रटता  है 
यही वो मुल्क है दुनिया को ग़ालिब ,मीर देता है 

यहाँ जंगल तितलियाँ ,फूल ,सूफी गीत गाते हैं 
मोहब्बत के फसानों को ये राँझा -हीर देता है 

जो अपने तन पे धुँधले रंग के कपड़े पहनता है 
जमाने को वही रंगों भरी तस्वीर देता है 
चित्र -गूगल सर्च इंजन से साभार 
[मेरी दोनों ही ग़ज़लें पुरानी और प्रकाशित हैं ]

Thursday, August 11, 2011

एक गीत -मजहब के झगड़ों से बाहर



चित्र -गूगल से साभार 
मजहब के झगड़ों से बाहर 
बम दिल्ली 
न्यूयार्क में फटे या 
लाहौर ,कराची |
आँसू सबके 
एक तरह हैं 
लंदन हो या राची |

नदी ,पेड़ 
फूलों का मजहब 
हमने कभी न जाना ,
मौसम हँसकर 
गाता रहता 
सात सुरों में गाना ,
राजमिस्त्री 
जैसे गढ़ता 
ताजमहल या साँची |

खजुराहो को 
देखें या देखें 
सौ बार अजन्ता ,
युग बहरा है 
कहाँ प्रेम की -
भाषा कोई सुनता ,
मारी गयी 
गुलेलों से 
जब कोई चिड़िया नाची |

वेटिकन हो 
पेरिस हो या कि 
ढाका ,अमृतसर हो ,
मजहब के 
झगड़ों से बाहर 
लेकिन अपना घर हो ,
क़ाबा और 
यरुशलम हो या 
कामकोटि काँची |

Friday, August 5, 2011

एक गीत -मौसमों के आधीन रहे

चित्र -गूगल से साभार 
मौसमों के आधीन रहे 
सूखा हो 
या बाढ़ 
मौसमों  के आधीन रहे |
मेघदूत 
अब खेतों की 
हरियाली छीन रहे |

परजा का दुःख 
भूले आये कितने 
राजा -रानी ,
आदमखोर 
व्यवस्था की 
कुछ बदली नहीं कहानी ,
आजादी के 
सपने 
कागज पर रंगीन रहे |

इंदर राजा 
राजसभा में 
मुजरे देख रहे ,
मौन सभासद 
अपनी -अपनी 
रोटी सेंक रहे ,
हम महलों के 
कचराघर में 
कूड़ा  बीन रहे |

आंधी -पानी 
तेज हवा के 
झोंकों से लड़ते ,
हम हारिल 
पंजे में सूखी 
टहनी ले उड़ते ,
आराकश 
बस पेड़ 
काटने में तल्लीन रहे |

मेले -हाट 
प्रदर्शनियाँ सब 
शहरों के हिस्से ,
भूखे पेट 
कहाँ तक सुनते 
अम्मी के किस्से ,
अपनी दुआ 
कुबूल कहाँ 
उनकी आमीन रहे |

Monday, August 1, 2011

सावन के रंग कैलाश गौतम के दोहों के संग

कवि -कैलाश गौतम 
समय -[08/01/1944-06/12/2006]
काव्य प्रेमियों के मानस को अपनी कलम और वाणी से झकझोरने वाले जादुई कवि का नाम है 'कैलाश गौतम'। जनवादी सोच और ग्राम्य संस्कृति का संवाहक यह कवि दुर्भाग्य से अब हमारे बीच नहीं है। आकाशवाणी इलाहाबाद से सेवानिवृत्त होने के बाद तत्कालीन उत्तर प्रदेश सरकार ने कैलाश गौतम को आजादी के पूर्व स्थापित हिन्दुस्तानी एकेडेमी के अध्यक्ष पद पर मनोनीत किया। एकेडेमी के अध्यक्ष पद पर रहते हुए इस महान कवि का 9 दिसम्बर 2006 को निधन हो गया। कैलाश गौतम को अपने जीवनकाल में पाठकों और श्रोताओं से जो प्रशंसा या ख्याति  मिली वह दशकों बाद किसी विरले कवि को ही  नसीब होती है। कैलाश गौतम जिस गरिमा के साथ हिन्दी कवि सम्मेलनों का संचालन करते थे उसी गरिमा के साथ कागज पर अपनी कलम को धार देते थे। 8 जनवरी 1944 को बनारस के डिग्घी गांव (अब चन्दौली) में जन्मे इस कवि ने अपना कर्मक्षेत्र चुना प्रयाग को। इसलिए कैलाश गौतम के स्वभाव में काशी और प्रयाग दोनों के संस्कार रचे-बसे थे। जोड़ा ताल, सिर पर आगतीन चौथाई आन्हर, कविता लौट पड़ी  बिना कान का आदमी  आदि प्रमुख काव्य कृतियां हैं जो कैलाश गौतम को कालजयी बनाती हैं। जै-जै सियाराम, और 'तम्बुओं का शहर' जैसे महत्वपूर्ण उपन्यास अप्रकाशित रह गये। 'परिवार सम्मान', प्रतिष्ठित ऋतुराज सम्मान और मरणोपरान्त तत्कालीन उत्तर प्रदेश सरकार ने कैलाश गौतम को 'यश भारती सम्मान' (राशि पांच लाख रुपये) से  सम्मानित किया था |अमौसा क मेला, कचहरी और गांव गया था गांव से भागा कैलाश गौतम की सर्वाधिक लोकप्रिय रचनाएं हैं। आज कैलाश गौतम के कुछ सावन कुछ प्रेम और कुछ मौसम के रंग में डूबे दोहे आपके समक्ष सादर अवलोकनार्थ प्रस्तुत हैं 
कैलाश गौतम के कुछ सावनी  दोहे 
सावन की झिर -झिर हवा ,देह तोड़ता ताल 
तनी रही जो झुक गयी ,वो कदम्ब की डाल 

मेघ घिरे पानी गिरा ,निखरे पेड़ -पहाड़ 
ऐसे में बज्जर हुए ,खुलते नहीं किवाड़ 

कैसा सहज मिठास है ,अद्भुत है संवाद 
सदा रहेंगे याद ये मन्दिर और प्रसाद 

घटा सलोनी -साँवली ,ये लहराता ताल 
दोनों ही कह -सुन रहे ,अपना -अपना हाल 

धान उगे है खेत में ,फैला धानी रंग 
झिर -झिर -झिर बौछार में ,रेशम लिपटा अंग 

जल को छूना होंठ से ,और फूल से देह 
दर्पण -दर्शन की तरह ,अद्भुत है ये नेह 

जल्दी में संकेत भी जल्दी में संवाद 
अभी कानपुर ,लखनऊ अभी इलाहबाद 

दिन डूबा सूरज गया ,किस्सा हुआ तमाम 
अँजुरी में दीपक लिए ,घर -घर पहुंची शाम 

धान बुलाते शान से ,देते हाथ सिवान 
घर की चौखट पर खड़ी ,गोरी तोड़े तान 

मन का सौदा हो गया ,ऐसा बिना हिसाब 
सिरहाने उलटी पड़ी ,देखो खुली किताब 

दफ़्तर में बादल घिरे ,रस्ते में बरसात 
सूने घर को क्या कहें ,नींद न आयी रात 

अंगिया छोटी हो गयी ,लगे टूटने बंद 
कहाँ तुम्हारे स्वर पिया कहाँ हमारे छंद 

ये बजरे की चाँदनी ये गंगा की धार 
भीतर -भीतर टीसता पहला -पहला प्यार 

आँख खुली मौसम खुला ,खुले खेत के खेत 
खुलते -खुलते रह गए ,बंधे -बंधे संकेत 

आकर्षण की छाँह में ,लाज -शील -संकोच 
प्यासी चिड़िया खोलती ,रह -रह जैसे चोंच 

इन्द्रधनुष जब से गए ,तब से हुआ न खेल 
खेत न फूटीं क्यारियाँ ,छप्पर चढ़ी न बेल 


मन बदला ,बदली दशा ,बदले खेत कछार 
कन्धे पर उत्सव लिए उतरा है त्यौहार 


नया -नया है डाकिया ,पूछ रहा है नाम 
क्या जाने केसर गली किसकी नींद हराम 


लट बिखरी आंचल उड़ा ,खुले नदी के द्वीप 
पारे जैसी कांपती और हाँफती सीप 


अँजुरी में जूड़ा खुला ,साँसों बसी सुवास 
संयम धोखा दे गया ,टूट गया उपवास 


हंसी ,चिकोटी, गुदगुदी ,चितवन छुवन ,लगाव 
सीधी -सादी राह में ये हैं ,मधुर पड़ाव 
चित्र -गूगल सर्च इंजन से साभार