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| कवि -संजय मासूम [जन्म -05/08/1965] |
जिस जनपद की पवित्र मिट्टी में राही मासूम रजा ,कुबेरनाथ राय ,विवेकी राय ,उमाशंकर तिवारी और अमरनाथ श्रीवास्तव जैसे नामचीन लेखक और कवि पैदा हुए ,उसी मिट्टी में जन्में हैं हिन्दी के सुपरिचित गज़लकार भाई संजय मासूम |जी हाँ यह वही संजय मासूम हैं , जिन्होंने कृष् और इंडियन जैसी फिल्मों के डायलाग लिखे हैं |हिन्दी गज़ल में संजय मासूम किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं |अपनी समकालीन सोच और कल्पना की उड़ान के बल पर संजय मासूम ने हिन्दी गज़ल में अपना एक पुख्ता मुकाम बना लिया है |इस कवि /शायर का जन्म 05 अगस्त 1965 को गाज़ीपुर जनपद [यू० पी० ]में हुआ |संजय मासूम [ वास्तविक नाम संजय कुमार श्रीवास्तव ]इलाहाबाद विश्व विद्यालय से विधि स्नातक की उपाधि हासिल कर पत्रकारिता के पेशे से जुड़ गये |मनोरमा ,धर्मयुग और नवभारत टाइम्स से समय -समय पर जुड़े किन्तु अब मुंबई में रहकर स्वतंत्र लेखन और फिल्म लेखन कर रहे हैं |मशहूर शायर एहतराम इस्लाम कहते हैं -कोई भी व्यक्ति यदि समाज की दुखती रगों पर हाथ रखना जानता हो और अपनी अनुभूतियों को कम शब्दों में चुटीला बनाकर अभिव्यक्त करने के हुनर से वाकिफ़ हो तो उसे एक अच्छा गजलकार बनने में कुछ देर नहीं लगती और संजय मासूम में यह बातें शुरू से मौजूद थीं |प्रख्यात शायर निदा फाज़ली कहते हैं -गज़ल हर युग में जिन्दगी की हमकदम रही है |जिन्दगी के साथ इसकी चाल और जमाल में भी मुसलसल तब्दीलियां आती रही हैं |कभी ये सूफियों की संगत में बैठी हैं कभी ये दरबारों में खुलकर खेली हैं ,कभी इसने हालत को तस्वीर किया है ,कभी उपदेशों को तहरीर किया है ....अब ये नई पीढ़ी की नाराजगी का साथ निभा रही हैं |ये नाराजगी गज़ल का नया रूप है |अपने इस नये रूप में गज़ल जिन समस्याओं से लड़ रही है वो तीसरी दुनियां की सामूहिक समस्याएं हैं ,इसके अहसास और दर्द को विकासशील देशों के साहित्यिक पैमानों से नहीं जांचा जायेगा ...इसके मूल्यांकन के लिए हमें उस आँख को रोशन करना होगा जिससे हमने कबीर और नजीर को जाना है या धूमिल और हबीब जालिब को पहचाना है ...संजय मासूम भी उसी विद्रोही पीढ़ी के गज़लकार हैं | यहीं कहीं संजय मासूम का गज़ल संग्रह है जिसकी भूमिका निदा फाज़ली ने लिखी है ,यह संग्रह 1990 में परिदृश्य प्रकाशन मुंबई से प्रकाशित हुआ है |हम इस चर्चित गज़लकार की पांच गज़लें आप तक पहुंचा रहे हैं |
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| चित्र -गूगल सर्च इंजन से साभार |
संजय मासूम की पांच गज़लें
एक
ये कैसे खौफ़ के मंजर हवा में उड़ते हैं
हरेक सिम्त नुचे पर हवा में उड़ते हैं
हमारा अम्न हवाओं में उड़ रहा है यों
लहूलुहान कबूतर हवा में उड़ते हैं
जमीं पे रहने की आदत नहीं इन्हें शायद
यहाँ के लोग जो अक्सर हवा में उड़ते हैं
बतायें आपको क्या अपने शहर के हालात
जरा सी बात पे खंजर हवा में उड़ते हैं
पतंग और कबूतर का अब नहीं है चलन
छतों से शाम को पत्थर हवा में उड़ते हैं
फकत उड़ान से ऊंचाइयां नहीं मिलतीं
कि जर्द पत्ते भी अक्सर हवा में उड़ते हैं
दो
तनहा बैठी ,गहना कपड़ा सोच रही है
लड़की अपनी उम्र का बढ़ना सोच रही है
इतनी लम्बी शाख है फिर भी बे- पत्ता है
नंगे तार पे बैठी चिड़िया सोच रही है
नन्हें हाथ अगर गायब हैं क्यों गायब हैं
फूल पे बैठी तितली तनहा सोच रही है
डिग्री ,कुर्सी ,बंगला -गाड़ी ,नाती पोते
माँ भी क्या -क्या उल्टा -सीधा सोच रही है
गुस्से से बौराया सागर सोच रहा है
सरिता अपना आगा पीछा सोच रही है
तीन
खूँ करो या रेल की पटरी उड़ाकर देख लो
हल नहीं होंगे मसाइल आजमाकर देख लो
रोक पाया कौन अब तक रोशनी का रास्ता
बादलों तुम सामने सूरज के आकर देख लो
हरहराता ये समन्दर रास्ता बन जायेगा
तीर साधो या कोई पत्थर उठाकर देख लो
जिस्म पर कस जायेगा ये जाल थोड़ा और भी
ऐ परिंदों और थोड़ा फड़फड़ा कर देख लो
चार
बहुत ही तल्ख है मेरी जुबान ये सच है
मैं साफगो हूँ बहुत साहिबान ये सच है
लगे भले ही कि धरती से मिल रहा है गले
झुका नहीं है मगर आसमान ये सच है
ये बात और है पिघला न पायी धूप मुझे
नहीं था सर पे मगर साएबान ये सच है
दरख्त खा गये फल ,पी गयी नदी पानी
ये है हमारी सदी का बयान ये सच है
पांच
कुछ खोना कुछ पाना चलता रहता है
सांसों का अफसाना चलता रहता है
नींदों वाले ख्वाबों और हकीकत में
युद्ध यहाँ रोजाना चलता रहता है
कुछ मिट जाते हैं तो कुछ बच जाते हैं
वक्त का आना जाना चलता रहता है
मंजिल -वंजिल कैसी कोई फ़िक्र नहीं
मनमौजी दीवाना चलता रहता है
अब भी चिड़िया चुग जाती है खेतों को
इक दो दिन पछताना चलता रहता है
हिंदू -मुस्लिम आते -जाते रहते हैं
नुक्कड़ का मैखाना चलता रहता है
[पांचवीं गज़ल को जगजीत सिंह जी ने गाया है ]