Friday, April 29, 2011

मेरे दो नवगीत

चित्र -गूगल सर्च इंजन से साभार
पहले जैसी  नहीं गाँव की रामकहानी है 

पहले जैसी 
नहीं गाँव की 
रामकहानी है |
जिसका है 
सरपंच उसी का 
दाना -पानी है |

परती खेत 
कहाँ हँसते अब 
पौधे धानों के ,
झील -ताल 
सब बंटे हाथ 
मुखिया -परधानों के ,
चिरई -चुनमुन नहीं 
मुंडेरों पर 
हैरानी है |

आसमान से झुंड 
गुम हुए 
उड़ती चीलों के ,
उत्सवजीवी रंग 
नहीं अब रहे 
कबीलों के ,
मुरझाये 
फूलों पर बैठी 
तितली रानी है |

मंदिर में 
पूजा होती अब 
फ़िल्मी गानों से ,
राजपुरोहित से 
टूटे रिश्ते 
यजमानों के ,
शहरों जैसे 
रंग -ढंग 
अब बोली -बानी है |

रोजगार 
गारंटी की 
यह बातें करता है ,
पीढ़ी दर 
पीढ़ी किसान बस 
कर्जा भरता है ,
कागज पर 
सदभाव`
धरातल पर शैतानी है |

दो 
आग में लिपटे हुए ये  वन चिनारों के 
आग में 
लिपटे हुए 
ये वन चिनारों के |
गीत अब 
कैसे लिखेगें 
हम बहारों के |

खेत परती 
बीडियाँ 
सुलगा रहा कोई ,
गीत बुन्देली 
हवा में 
गा रहा कोई ,
सूखती 
नदियाँ ,फटे सीने 
कछारों के |

एक चिट्ठी 
माँ !तेरी 
कल शाम आयी है ,
और यह 
चिट्ठी बहुत ही 
काम आयी है ,
शुष्क चेहरे पर 
पड़े छींटे 
फुहारों के |

यह शहर 
महँगा ,यहाँ है 
भूख -बेकारी ,
हर कदम पर 
हम हरे हैं पेड़ 
ये आरी ,
पाँव के 
नीचे दबे हम 
घुड़सवारों के |
[मेरे दोनों गीत कोलकाता से प्रकाशित जनसत्ता दीपावली वार्षिकांक २०१० में प्रकाशित हैं ]

Wednesday, April 27, 2011

एक गीत -टूटे हुए पंख चिड़ियों के

चित्र -गूगल सर्च इंजन से साभार
    
टूटे हुए पंख चिड़ियों के


नंगी पीठ 
गठरियाँ उन पर 
नौनिहाल हो रहे कबाड़ी |
आप चलाते 
गाँव - गाँव में 
उम्मीदों की आंगनबाड़ी |

इन्हें पता क्या 
गन्ध गुलाबी और 
पतंगों की उड़ान क्या ?
उबड़खाबड़ रेल -
पटरियों पर चलते 
इनको थकान क्या ?
हर रस्ता 
इनका साथी है 
दलदल हो या कठिन पहाड़ी |

इन्हें पता क्या 
मेघदूत में क्या लिक्खा 
किसकी किताब है ,
कचरे में  कुछ अच्छा 
कचरा मिल जाये 
बस यही ख़्वाब है ,
मीलों
बिना थके चलते हैं ,
ये हैं बिन पहियों की गाड़ी


आप भद्रजन !
अपने -अपने 
भाग ,गुणनफल में  हैं  उलझे ,
विकसित हुई 
सभ्यताओं के ये हैं 
कठिन प्रश्न अनसुलझे ,
सुविधाओं के 
इस समुद्र में 
इनकी किस्मत फूटी हाड़ी |

इनके जूड़े 
सजे हुए हैं 
टूटे हुए पंख चिड़ियों के ,
इनको स्वप्न 
नहीं आते हैं 
बार्बी डालों या गुड़ियों के ,
ये आंधी में 
उड़ते पत्ते क्या पर्वत 
क्या समतल ,खाड़ी |

इनके रिश्ते 
जंतर -मंतर 
ओझा -सोखा जादू -टोने ,
जूठन खाकर 
जीते -मरते 
अंजुरी इनके थाल -भगोने ,
जली हुई 
बीडियाँ उठाते 
या ताड़ों पर पीते ताड़ी |

टूटे पुल या 
मलिन बस्तियाँ ही हैं 
इनके भाग्य विधाता ,
धूप और बारिश में 
इनके सिर पर 
हो जातीं है छाता ,
बिना टॉस के 
अंपायर के 
खेल रहे ये खेल ,खिलाड़ी |

चित्र -गूगल से साभार 
[यह गीत कूड़ा बीनकर गुजर- बसर करते बच्चों और बच्चियों को समर्पित है ]

Tuesday, April 26, 2011

कवि गोष्ठी एवं सम्मान समारोह -आयोजक- इटावा हिन्दी सेवा निधि



बायें युवा कवि श्लेष गौतम को शिशु बल्लभ अलंकरण से सम्मानित करते हुए मुख्य अतिथि माननीय पूर्व मुख्य न्यायमूर्ति[गुवाहाटी उच्च न्यायालय ]  श्री वी० के० खन्ना [चित्र में दायें ]
विगत 23 अप्रैल को शाम 7 बजे राष्ट्र भाषा हिन्दी के लिए समर्पित साहित्य मनीषी माननीय न्यायमूर्ति [सेवानिवृत्त ]श्री प्रेमशंकर गुप्त जी द्व्रारा स्थापित इटावा हिन्दी सेवा निधि के तत्वाधान में संस्था के सचिव प्रदीप कुमार के[ जार्ज टाउन इलाहाबाद]  आवास पर पारिवारिक माहौल में एक सरस काव्य संध्या का आयोजन किया गया |अवसर था हिन्दी के उदीयमान कवि श्लेष गौतम [स्व० कैलाश गौतम के सुपुत्र ]को सम्मानित करना |समारोह के मुख्य अतिथि गुवाहाटी उच्च न्यायालय के पूर्व मुख्य न्यायधीश माननीय श्री वी० के० खन्ना द्वारा श्लेष गौतम को उदीयमान कवि के रूप में शिशु -बल्लभ सम्मान से प्रशस्ति पत्र ,अंग वस्त्रम ,प्रतीक चिन्ह ग्यारह सौ रूपये की राशि देकर सम्मानित किया गया |स्मरणीय रहे यह सम्मान समारोह प्रतिवर्ष इटावा में आयोजित किया जाता है जो न्यायमूर्ति  प्रेमशंकर गुप्त जी का गृह जनपद है |यह सम्मान समारोह विगत 26दिसम्बर  2010 को आयोजित किया गया था जिसमें सुविख्यात साहित्यकार श्री गिरिराज किशोर को जनवाणी सम्मान दिया गया था, इसके अतिरिक्त अन्य कई बिभूतियों को सम्मानित किया गया था |उपरोक्त समारोह में कतिपय अपरिहार्य कारणों से श्लेष गौतम शामिल नहीं हो पाये थे |इसलिए संस्था के अध्यक्ष माननीय न्यायमूर्ति [सेवानिवृत्त ]श्री प्रेमशंकर गुप्त जी ने इलाहाबाद में अलग से यह आयोजन किया ,यह उनकी विनम्रता का परिचायक है |इस गोष्ठी में संस्था के न्यासी और पूर्व न्यायमूर्ति वीरेन्द्र दीक्षित जी और माननीय मुख्य न्यायमूर्ति [सेवानिवृत्त ]श्री वी० के० खन्ना जी की धर्मपत्नी श्रीमती वर्षा जी  भी मौजूद थीं  |कार्यक्रम का संचालन माननीय न्यायमूर्ति प्रेमशंकर गुप्त जी ने स्वयं किया |कार्यक्रम के प्रारम्भ में पूर्व प्राचार्य श्री विभु राम मिश्र जी ने श्लेष गौतम के व्यक्तित्व और कृतित्व पर प्रकाश डाला |अतिथियों का स्वागत श्री दिलीप कुमार और अशोक कुमार ने तथा धन्यवाद ज्ञापन संस्था के सचिव  श्री प्रदीप कुमार एडवोकेट ने किया |इस कार्यक्रम में आयोजित कवि गोष्ठी में इलाहाबाद प्रगतिशील लेखक संघ के अध्यक्ष एहतराम इस्लाम ,श्लेष गौतम ,यश मालवीय और मुझे [जयकृष्ण राय तुषार ]आमंत्रित किया गया था |काव्य पाठ का शुभारंभ एहतराम इस्लाम से हुआ और समापन श्लेष गौतम से हुआ |गोष्ठी में पढ़ी गयी कविताओं के चुनिंदा अंश -

याद तेरी रात भर का जागरण दे जायेगी |
स्वप्न की भाषा को लेकिन  व्याकरण दे जायेगी |

स्वर्ण -मृग की लालसा क्षण भर भी टिक सकती थी क्या 
यदि पता होता कि वह सीता -हरण दे जायेगी |

हाय शिक्षा- नीति ,सोचा ही नहीं जिसने कभी 
वह नई पीढ़ी को कैसा आचरण दे जायेगी |

और कुछ दे या न दे संघर्ष की गंभीरता 
मेरी गज़लों के लिए वातावरण दे जायेगी | एहतराम इस्लाम 
हतराम इस्लाम के बाद मुझे काव्य पाठ के लिए बुलाया गया और तन्मयता से सुना गया |इसके बाद सुपरिचित गीत कवि यश मालवीय ने अपनी कविता रामसुभग के माध्यम से चुनाव और व्यवस्था पर जमकर प्रहार किया |अपने काव्य पाठ के अंत में यश जी ने पिता पर लिखे  चर्चित गीत का सस्वर काव्य पाठ कर माहौल को भावुक कर दिया -
तुम छत से छाये 
जमीन से बिछे 
खड़े दीवारों से 
तुम घर के आँगन 
बादल से घिरे 
रहे बौछारों से |
तुम अलबम से दबे पाँव
जब बाहर आते हो 
कमरे -कमरे अब भी अपने  
गीत गुंजाते हो 
तुम बसंत होकर 
प्राणों में बसे 
लड़े पतझारों से 
तुम ही चित्रों से 
फ्रेमों में जड़े 
लदे हो हारों से .....यश मालवीय 


काव्य पाठ का समापन श्लेष गौतम की कविताओं से हुआ |
हों चाहे लोग जितने फिर भी घर वीरान लगता है 
जो एक बेटी न हो तो घर भी कब्रिस्तान लगता है या एक दोहा देखिए -
आज जहां भी जाइये हावी है दरबार 
कद वाले बौने हुए ,परछाईं मीनार -श्लेष गौतम 
बिलकुल ही पारिवारिक माहौल में सम्पन्न हुए इस गरिमामय आयोजन का समापन स्वल्पाहार के साथ हुआ |

Saturday, April 16, 2011

गीत -इस सुनहरी धूप में

चित्र -गूगल सर्च इंजन से साभार 
इस सुनहरी धूप में 

इस सुनहरी धूप में 
कुछ देर बैठा कीजिए  |
आज मेरे हाथ की 
ये चाय ताजा पीजिए |

भोर में है आपका रूटीन 
चिड़ियों की तरह ,
आप कब रुकतीं ,हमेशा 
नयी घड़ियों की तरह ,
फूल हँसते हैं सुबह 
कुछ आप भी हँस लीजिए |

दर्द पाँवों में उनींदी आँख 
पर उत्साह मन में ,
सुबह बच्चों के लिए 
तुम बैठती -उठती किचन में ,
कालबेल कहती बहनजी 
ढूध तो ले लीजिए |

मेज़ पर अखबार रखती 
बीनती चावल ,
फिर चढ़ाती देवता पर 
फूल अक्षत -जल ,
पल सुनहरे ,अलबमों के 
बीच मत रख दीजिए |
,
हैं कहाँ  तुमसे अलग 
एक्वेरियम की मछलियाँ ,
अलग हैं रंगीन पंखों में 
मगर ये तितलियाँ ,
इन्हीं से कुछ रंग ले 
रंगीन तो हो लीजिए |

तुम सजाती घर 
चलो तुमको सजाएँ ,
धुले हाथों पर 
हरी मेहँदी लगाएं ,
चाँद सा मुख ,माथ पर 
सूरज उगा तो लीजिए |
चित्र -गूगल सर्च इंजन से साभार 

Friday, April 15, 2011

एक नवगीत -तेरी क्या तस्वीर लिखूँ ?

चित्र -गूगल सर्च इंजन से साभार 

भारत माता तेरी क्या तस्वीर लिखूं 
भारत माता 
तेरी 
क्या तस्वीर लिखूं ?
दिल्ली 
या गुजरात कि 
मैं कश्मीर लिखूं |

मुखिया का 
ईमान 
मुखौटों वाला है ,
परजा के 
मुँह गोदरेज का 
ताला है ,
टू जी 
थ्री जी 
या इससे गम्भीर लिखूँ |

लूटपाट 
अपहरण 
फिरौती ,हिंसा है ,
नये दौर में 
ये ही 
सत्य -अहिंसा है ,
फांसी पर 
लटकी 
रांझे की हीर लिखूँ |

नीति -नियंता 
गिरवीं 
हाथ दलालों के ,
हम गुलाम 
शहरों के 
शापिंग मालों के ,
पेड़ 
बबूलों के 
कैसे अंजीर लिखूँ |

राजमार्ग पर 
टोल टैक्स के 
पहरे हैं ,
लालकिले के 
भाषण 
बहुत सुनहरे हैं ,
काशी 
मगहर चुप  हैं 
किसे कबीर लिखूँ |


अब सत्यमेव 
जयते में 
सत्य नहीं मिलता ,
यह ताल 
सियासी इसमें 
कमल नहीं खिलता ,
तेरी चुप्पी -
मौन, कि 
मैं जंजीर लिखूँ |


इस राजव्यवस्था 
को कोई तो 
बदलेगा ,
फिर तेरे  ही 
आंचल से 
सूरज निकलेगा ,
फिर सिंहवाहिनी 
तुझको 
गंगा नीर लिखूँ |

Tuesday, April 12, 2011

मेरी दो गज़लें

चित्र -गूगल सर्च इंजन से साभार 
एक 
छत बचा लेता है मेरी ,वही पाया  बनकर 
मुझको हर मोड़  पे मिलता है फरिश्ता बनकर

तेरी यादें कभी तनहा नहीं होने देतीं 
साथ चलती हैं मेरे ,धूप में साया बनकर 

तंगहाली में रही जब भी व्यवस्था घर की 
मेरी माँ उसको छिपा लेती है परदा बनकर 

आज के दौर के बच्चे भी कन्हैया होंगे 
आप पालें तो उन्हें नंद यशोदा बनकर

घर के बच्चों से नहीं मिलिये  किताबों की तरह 
उनके जज्बात को पढ़िये तो खिलौना बनकर 
दो 
वही उड़ान का का असली हुनर दिखाते हैं 
तिलस्म तोड़ के आंधी का,  घर जो आते हैं 

कभी प्रयाग के संगम को देखिये आकर 
यहाँ परिंदे भी डुबकी लगाने आते हैं 

ये बात सच है कि  दरिया से दोस्ती है मगर 
मल्लाह डूबने वालों को ही बचाते हैं 

लिबास देखके मत ढूंढिए फकीरों को 
कुछ जालसाज भी चन्दन तिलक लगाते हैं 

कब इनको खौफ़ रहा जाल और बहेलियों का 
परिंदे बैठ के पेड़ों पे चहचहाते  हैं 

हम अपने घर को भी दफ़्तर बनाये बैठे हैं 
परीकथाओं को बच्चों को कब सुनाते हैं 


किसी गरीब के घर को मचान मत कहना 
कबीले पेड़ की शाखों पे घर बनाते हैं 
चित्र -गूगल सर्च इंजन से साभार 

Saturday, April 9, 2011

एक प्रेम गीत -देखकर तुमको फिरोजी दिन हुए

चित्र -गूगल सर्च इंजन  से साभार 
देखकर तुमको फिरोजी  दिन हुए 

तुम्हें देखा 
भूल बैठा मैं 
काव्य के सारे सधे  उपमान |
ओ अपरिचित ! 
लिख रहा तुमको 
रूप का सबसे बड़ा प्रतिमान |

देख तुमको 
खिलखिलाते फूल 
जाग उठती शांत जल की झील ,
खिड़कियों को 
गन्ध कस्तूरी मिली 
जल उठी मन की बुझी कंदील ,
इन्द्रधनु सा 
रूप तेरा देखकर 
हो रहे पागल हिरन ,सीवान |


मौन  जंगल सज 
रहीं  संगीत संध्याएं  
खुले चिड़ियों के नये स्कूल,
कभी रक्खे थे 
किताबों में जिन्हें 
मोरपंखों को गये हम भूल ,
तू शरद की 
चाँदनी शीतल 
और हम दोपहर के दिनमान |


हाशिये  नीले ,हरे होने लगे 
लौट आये 
फिर कलम के दिन,
कल्पनाओं के 
गुलाबी पंख ओढ़े 
हम तुम्हें लिखने लगे पल -छिन 
हमें जाना था 
मगर हम रुक गये 
खोलकर बांधा हुआ  सामान |


देखकर तुमको 
फिरोजी दिन हुए 
हवा में उड़ता हरा रुमाल ,
फिर कहीं 
गुस्ताख भौरें ने छुआ 
फूल का बायां गुलाबी गाल ,
सज गए फिर 
मेज़ ,गुलदस्ते 
पी रहे  काफ़ी सुबह से लाँन |

चित्र -गूगल सर्च इंजन से साभार 

Friday, April 8, 2011

एक नवगीत

चित्र -गूगल सर्च इंजन से साभार 
सुलगते सवाल  कई छोड़ गया मौसम 

सुलगते 
सवाल कई 
छोड़ गया मौसम |
मानसून 
रिश्तों को 
तोड़ गया मौसम |

धुआँ -धुँआ 
चेहरे हैं 
धान -पान खेतों के ,
नदियों में 
ढूह खड़े 
हंसते हैं रेतों के ,

पथरीली 
मिट्टी को 
गोड़  गया मौसम |

आंगन कुछ 
उतरे थे 
मेघ बिना पानी के ,
जो कुछ हैं 
पेड़ हरे 
राजा या रानी के ,

मिट्टी के 
मटके हम 
फोड़ गया मौसम |

मिमियाते 
बकरे हम 
घूरते कसाई ,
शाम -सुबह 
नागिन सी 
डंसती मंहगाई ,

चूडियाँ 
कलाई की 
तोड़ गया मौसम |
चित्र -गूगल सर्च इंजन से साभार 

Wednesday, April 6, 2011

यत्रा संस्मरण - संदर्भ-सिसली [ इटली] -लेखिका -प्रोफेसर अनीता गोपेश

प्रोफेसर अनीता गोपेश इलाहाबाद यूनिवर्सिटी [फोटो-सिसली प्रवास के समय की है ]
सम्पर्क  -09335107168
परिचय -अनीता गोपेश जी प्रतिष्ठित इलाहाबाद यूनिवर्सिटी के प्राणी विज्ञान विभाग में प्रोफेसर हैं |देश - विदेश के प्रतिष्ठित जर्नल्स /शोध पत्रों में इनके आलेख प्रकाशित होते रहते हैं |विज्ञान विषय के पठन -पाठन से जुड़े होने के बावजूद प्रोफेसर अनीता  गोपेश एक बेहतरीन कथा लेखिका भी हैं |इनकी कहानियाँ हिन्दी की प्रतिष्ठित पत्र -पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रहती हैं |कित्ता पानी इनका महत्वपूर्ण कथा संग्रह है |प्रोफेसर अनीता गोपेश का जन्म 24/08/1954में इलाहाबाद में हुआ था |इनके पिता स्वर्गीय गोपीकृष्ण गोपेश जाने माने कवि और रुसी   भाषा के प्रोफेसर थे |प्रोफेसर अनीता गोपेश हाल ही में [2010] सिसली [इटली] गयी थीं |हम अंतर्जाल के माध्यम  से उनके इस यात्रा संस्मरण को आपके साथ साझा कर रहे हैं |

भूमध्य सागर में एक नगीना सिसली

लांग लेग इटली किक्ड पुअर ,सिसली इन्टू द मेडिटरेनीयन सी |बचपन में कान्वेंटीयन सहेलियों से अक्सर ये पंक्ति सुनी थी ,पर सोचा नहीं था कि इसका अर्थ कभी यूँ मुझ पर खुलेगा |यूरोप का नक्शा देखिये तो इस पंक्ति के मतलब स्पष्ट हो जाते हैं |नक्शे पर नीचे की ओर ऊँगली की तरह बढा हुआ इटली और उसके निचले सिरे से सागर में स्थित एक तिकोना द्वीप जैसे भूमध्य सागर में गिरा एक नगीना |इससे पहले हम सिसली को मारियो पूजो के विश्व प्रसिद्ध उपन्यास गाडफादर और ढेरों कैसीनो के नाते ही जानते थे |वहाँ जाते समय हवाई जहाज से नीचे देखने पर चारो ओर फैले नीलमवर्णीय समुद्र का अनंत विस्तार और बीच में नगीनों की तरह पड़े भूखंडों से पता चलता है कि पूरा सिसली प्रान्त भूमध्य सागर में पड़े एक बड़े तिकोने मोती जैसा एक द्वीप है |इटली का नाम लेते ही प्रायः लोगों के जेहन में रोम ,फ्लोरेंस वेनिश या नेपल्स का ही नाम आता है |अपने वैज्ञानिक सहयोगी के साथ अपने विषय पर जब खतो -खिताबत हुई तो उन्होंने बताया कि सिसली भी इटली के दूसरे शहरों की तरह ही खूबसूरत ,हरियाली और प्राकृतिक सम्पदाओं ,कला ,विज्ञान संस्कृति और परम्पराओं से समृद्ध एक खंड है ,पर इटली के दूसरे शहरों से इतर औद्योगीकरण से थोड़ा बचा हुआ है |अपनी भौगोलिक सीमाओं में रचा -बसा यह एक खूबसूरत द्वीप है ,जो अपने आप में व्यस्त ,मस्त और संतुष्ट है |

बायें -प्रोफेसर अनीता गोपेश [लेखिका ]दायें प्रोफेसर इक्सेंद्रा[ बायो केमिस्ट्री विभाग  मेसिना यूनिवर्सिटी इटली ]
दिल्ली फ्रैंकफर्ट के रास्ते सिसली के एक खूबसूरत शहर कतानियाँ में उत्तरी कतानियाँ से मेसिना शहर तक तक का रास्ता कार से तय किया |हवाई अड्डे पर लेने आये शोधार्थी को देख इटली की खूबसूरती का प्रथम आभास हुआ |पूरा रास्ता एक सुप्रसिद्ध हाइवे है ,समुद्र के किनारे से चलता हुआ |रास्ते से गुजरते हुए सर्वप्रथम परिचय होता है समुद्र तटीय आबोहवा और उससे उपजी अविराम खूबसूरत हरियाली से जो स्वप्न की ही तरह खूबसूरत है |इस प्राकृतिक सम्पदा को सहेजे ,उन्हीं के बीच से गुजरती एक दूसरे को काटती बड़ी -बड़ी सडकें ,अलग -अलग शहरों को जाते हुए कमर के बल मुड़ते रास्ते और उन पर बने बड़े -बड़े फ्लाई-ओवेर्स , जो इस स्थान के विकास और समय के साथ कदमताल करने का परिचय देते हैं |सड़क के एक तरफ समुद्र तो दूसरी तरफ मझोले आकार की पहाड़ियां ,सागर और पर्वत की ऐसी गलबहियां कम ही देखने को मिलती हैं गगनचुम्बी इमारतें और बड़े -बड़े मॉल वहाँ नहीं दिखाई देते हैं |इसलिए मेसिना शहर आज के मेट्रो सिटीज से भिन्न और सुंदर दिखता है |मध्यम ऊँचाई की इमारतों को देखकर समझ में आता है कि ये सारी इमारतें नई बनी हैं |सन 1849 और 1908 में आये भूकम्प के कारण यह शहर यह शहर कोई पांच -छह फुट  धंस गया था |भूकम्प के बाद पूरे शहर को नये सिरे से आबाद किया गया था |लगभग हर इमारत में उस धंसे हिस्से को बचाकर रक्खा गया है ,इसे शीशे या प्लास्टिक की शीट से ढककर रखा गया है |इस शहर के लोग उस साहस को याद रखना चाहते हैं जिससे यह शहर फिर से आबाद हो सका |
कातानिया शहर का समुद्र तट 
यूनिवर्सिटी जाते हुए रोज देखती हूँ ,समुद्र तट पर नहाते -धूप खाते लोग |घूमने कहीं भी जाऊँ ,हर जगह समुद्र तट पर लोगों की भीड़ ,पर गंदगी रत्ती भर भी नहीं |कैसे सम्भव करते हैं ये ?अपने मुंबई के जुहू चौपाटी बीच की गंदगी और पानी की लहरों के साथ हर बार किनारे तक आते कबाड़ की याद आती है |मन उदास हो जाता है |
छत से मेसिनो शहर का विहंगम दृश्य 
मेसिनो शहर के सात छोटे -छोटे खूबसूरत द्वीप हैं |जिन्हें ;अयोलीयन द्वीप समूह 'के नाम से जाना जाता है |आयोलियन वायु के ग्रीक भगवान आयोलो के नाम पर पड़ा है |यहाँ के लोग ऐसा मानते हैं की वायु के देवता यहाँ कभी निवास करते थे |सात बड़े और छोटे -छोटे अनेक द्वीपों का समूह ;आयोलियन द्वीप समूह इसमें कभी सभी द्वीप ज्वालामुखी हुआ करते थे ,आज उनमें से स्ट्राम्बोली और वुल्कानों के अलावां सभी शांत हैं |यहाँ की पहाड़ियों की चट्टानों का विविध रंग और पानी का गहरा  फिरोजी रंग हरियाली के संग मिलकर पूरे परिदृश्य को जैसे किसी खूबसूरत कलाकृति में बदल देते हैं |उस पूरे परिदृश्य में अपनी उपस्थिति जैसे ;अविश्वसनीय किन्तु सत्य 'जैसी लगने लगती है |न जाने अन्य द्वीप कितने सुंदर होंगे |सचमुच दुनियां कितनी खूबसूरत है |हम कितना कम देख पाते हैं |

कतानिया शहर से उत्तर की ओर यूरोप का सबसे बड़ा सक्रिय ज्वालामुखी ;एटना माउन्ट 'है |इसी के कारण सिसली को लैंड ऑफ फायर [land of fire]कहा जाता है |इसमें 25 किमी० से अधिक से अधिक दूरी तक उपजाऊ काला लावा बिखरा पड़ा है |काले लावे के विस्तार में हरित क्षेत्र आते हैं ,जिनमें पागल कर देने वाली खुशबू वाले पीले फूलों के पेड़ अनवरत दिखाई पड़ते हैं |ये पेड़ ,हरियाली और लावा मिलकर इस पूरे क्षेत्र को एक अजब सा काला ,पीला ,हरा कलेवर प्रदान करते हैं ,जो किसी चित्र की तरह देखने वालों की आँखों में बस जाता है |रोचक बात यह है कि जाड़े में यही प्रदेश बर्फ़ से ढक जाता है और तब लोग यहाँ बर्फ़ के खेलों के लिए आते हैं |रत में इस माउन्ट से जहाँ केलेब्रियन समुद्र तट आयोलियन द्वीप समूह ,सायरा क्रूसा और टाओरमीना  जैसे छोटे खूबसूरत शहर दिखाई देते हैं ,वहीं मेसिना या कतानिया या टाओरमीना की पहाड़ियों से एटना माउन्ट से उठती हुई आग की रोशनी या धुआँ दिखाई देता है |विश्वास नहीं होता कि जिस एटना माउन्ट का जिक्र कहानियों में सुना करती थी ,उसकी पीक पर खड़ी होकर मैं चारो ओर का विहंगम दृश्य देख रही थी, जो दुनियां में और कहीं देखने को नहीं मिलेगा| लावा गिरने से बने अनेकों गड्ढों में से सबसे बड़े को बिग होल का नाम दिया गया है |

शनिवार -रविवार यहाँ पूरी तरह छुट्टी के दिन होते हैं |एक शनिवार निकल लेती हूँ ,वुल्कानों आइलैंड देखने |समुद्र में डेढ़ दो घंटे का जहाज का  सफर अविस्मरणीय था| उस अविराम सौंदर्य को निहारने का ,देखने का |मेसिना के उस पार दूसरा शहर है रेजियो कलाब्रिया |बंदरगाह के पास का जहाज से यात्रा का स्वरूप बिलकुल वैसे ही है जैसे अपने यहाँ बस का सफर |कुछ घूमने वाले होते हैं तो कुछ रोज काम पर जाने वाले तो कुछ रोज काम पर जाने वाले तो कुछ अपने लोगों को विजिट करने जाने वाले |वुल्कानों द्वीप शहर की हलचल से दूर हरी भरी छायादार सड़कों वाला एक बेहद खूबसूरत स्थान है,  जिसके शीर्ष पर ज्वालामुखी के अवशेष हैं |वहाँ तक जाने के लिए लोग सायकिल ,स्कूटर ,मोपेड या मो -बाइक किराये पर लेते हैं |सडकें सैर करने को ही बनीं हैं ,जैसे स्कूटर - कार के बीच के आकार के कुछ अजीब से वाहन दिखे जिस पर प्रेमी जोड़े या पति - पत्नी घूमते नजर आते हैं |द्वीप चारो ओर समुद्र से घिरा है |भाषा की समस्या के चलते मैं घूमने के लिए कोई सवारी नहीं पकड़ पाई |दिन भर के लिए मैं पैदल ही निकल पड़ी और घूमते - फिरते पास के सल्फर पूल में भी हो ली |यह खूबसूरत सी बीच बहुत कुछ अपने यहाँ कोवलम बीच जैसा है |पूरा सी बीच जैसे उन्मुक्तता का उत्सव मना रहा था |न्यूनतम कपड़े पहने लोगों के बीच सलवार कुर्ते दुपट्टे में ढकी मैं जैसे खुद ही असंगत और अश्लील लग रही थी |यहाँ के लोग जैसे शरीर के बोध से ही मुक्त हो चुके हैं |

रात देर से रेस्तरां या पब से निकलते लोग गलती से भी आपकी तरफ इसलिए नहीं देखते कि आप औरत हैं |निरापद सा लगता है पूरा माहौल जबकि भाषा की असुरक्षा हर समय बनी रहती है |ताज्जुब होता है कि यहाँ के लोग अंग्रेजी बिलकुल नहीं जानते |युनिवर्सिटी के विभागाध्यक्ष प्रोफ़े० मैक्री से जब -जब बात करने की जरूरत हुई अंग्रेजी के प्रोफेसर युजीनियो को बुलाना पड़ा जो कि इटालियन भी जानते थे और अंग्रेजी भी |यहाँ सारा काम अपनी भाषा में ही होता है |समझ में नहीं आता कि ये वैश्विक स्तर के शोध कार्य कैसे करते हैं |सोचने लगती हूँ कि अंग्रेजी न जानना एक बेहतर स्थिति है या कमतर |क्या अपने देश में ऐसा सम्भव है ?बाज़ार में डिपार्टमेन्टल स्टोर्स में अपने देश के उत्पादों की भरमार देखी तो लगा कि अपना देश दृश्य में भरपूर उपस्थित है |
एक सुबह प्रोफेसर के आने की प्रतीक्षा में तैयार होकर मैं बंद दुकान  सीढियों पर बैठी थी ,तभी एक तीस - पैतीस साल की युवती के साथ एक सूटेड - बूटेड उम्रदराज व्यक्ति सामने आकर रुके |मुझसे इटैलियन में युवती ने कुछ कहा मैंने इशारे से समझाया नों इटैलियन !साँरी युवती ने पूछाः इंगलिश जब तक मैं हामी भरती तब तक बुजुर्ग व्यक्ति ने पूछा इंडियानों ;मैं इतने दिनों में समझ चुकी थी कि ये इटैलियानों की तर्ज पर इंडियन को इण्डियानों कहते हैं |जब मैंने हामी भरी तो उस युवती ने हिन्दी में लिखा एक पृष्ठ मेरी तरफ बढा दिया |करोड़ों मील दूर एक परायी भूमि पर एक विदेशी के हाथों में हिन्दी देखकर मैं रोमांचित हो उठी |बाप - बेटी ईसाई धर्म के प्रचार के लिए निकले थे |कुछ दान चाहते थे ,मैंने सहर्ष दिया और अपना हस्ताक्षर हिन्दी में किया और गुनगुनाती हुई बैठी रही जय हो |यही उद्घोष मेसिना के एक बाज़ार के एक शोरूम में सुनाई पड़ा तो चौंक गयी |एक चौदह - पन्द्रह साल का लड़का गुलजार का एक  गीत गुनगुनाते शोरूम में घुसा तो मैं अपने आप को रोक नहीं पायी |अंदर घुसी तो चेहरे की रंगत भारतीय नजर आई ,गहने सजावट के सामान भी भारतीय |नगों - पत्थरों के गहनें जैसे दिल्ली के जनपथ पर दीखते हैं वैसे ही |मैं खोजती निगाहों को जब तक शब्द देती ,काउंटर की परली तरफ से खुशनुमा अभिवादन नमस्ते दीदी '!इण्डिया से आयी हैं क्या ?हाँ !आप कलकत्ता के हो क्या ?नहीं बंगाली तो हैं पर हम बांगलादेशी [बांग्लादेश ]फिर तो ऐसा लगा कि जैसे अपने देशों की सीमाएं तोड़ हम सब एक ही हो गये |दुकान पर कुछ श्रीलंकाई ,कुछ नेपाली और कुछ पाकिस्तानी भी मिलते गये |फिर तो हर दिन हर शाम को उस शोरूम में जाना और चाय पीकर आना होता रहा |श्रीकृष्ण ने अपने ढेर सारे विजिटिंग कार्ड दिये -यूनिवर्सिटी की लेडिज में बाँट देना दीदी |वो लोग आयेंगी हमारे दुकान पर आपके जाने के बाद भी |पराई भूमि पर देश की सीमाएं तोड़ एक होने का एहसास मेरे लिए एकदम नया था |

एक और  इल्हाम भी हुआ |इटैलियन लड़के लड़कियां बहुत खूबसूरत नैन नक्श वाले होते हैं और वे हम भारतीयों से बहुत मिलते जुलते हैं |सिर्फ काम्प्लेक्सन छोड़ दें तो इण्डियानों और इटैलियानों में काफी नजदीक नजर आते हैं |काम्प्लेक्सन उनका शायद कश्मीरी भारतीयों से मेल खाए |एक दिन प्रोफेसर एक्सेंद्रा ने मेरा दिया लखनवी टॉप और जींस पहना उस दिन मैंने भी वैसा ही  कुछ पहना हुआ था |वह बगल में खड़ी होकर कहने लगीं :अनीता यू लुक इटैलियानों मैंने बात उलट दी और खा एक्सेंद्रा यू लुक इण्डियानों "और वातावरण बहुत ही दोस्ताना हो गया |हमने साथ -साथ तस्वीरें भी खिंचवाई |उन्हें अपनी एक इटैलियन बेटी के इंडियन हो जाने का खूब एहसास है |प्रायः सभी सोनिया गाँधी के बारे में जानते हैं ,जानना चाहते हैं और गर्व महसूस करते हैं -इज सी मच रिस्पेक्टेड देयर ?सी इज इटैलियानों |'मैं उन्हीं की तरह टूटी फूटी अंग्रेजी में हाथ नचाकर कह देती हूँ -नों मोर इटैलियानों !सी इज कम्प्लीट इण्डियानों नाऊ लाईक अस 'वे बुरा नहीं मानते हँस देते हैं |

युवा लड़के लडकियां शाम से देर रात तक घूमने वाली जगहों पर खूब दिखाई देते हैं |सबसे जादा सिगरेट यही वर्ग पीता  नजर आता है |समुद्र के जहाजी बेड़े के पास जहां इंटरनेशनल रिक्रिएशनल क्लब भी है और सामने एक बड़ा पार्क भी |वहाँ रोज जाकर बैठती हूँ |किशोर लड़के लडकियां तरह - तरह की मोपेड ,मोबाइक से वहाँ आकर जमा होते हैं |चुहुल हंसी मजाक ,गाना बजाना ,चहलकदमी ,रोमांस ,सेक्स ,खाना - पीना सब होता है यहाँ |लडकियां वहाँ देर रात तक वहाँ हैंग करती दिखती हैं ,तो खयाल आता है इनके माँ बाप क्या चिंतित नहीं होते हैं ?क्या उन्हें पता होगा कि ये देर रात तक यहाँ क्या करते रहते हैं अपने यहाँ तो इतनी देर तक लड़की घर से बाहर रहे तो आफत ही हो जाए |पर शायद नहीं अपने यहाँ भी बड़े शहरों में ऐसा होने लगा है अब |देश ,संस्कार की सीमाएं टूटने लगी हैं ,चीजें बदल रही हैं |हम ग्लोबल हो रहे हैं |

map/चित्र -गूगल सर्च इंजन से साभार 


Saturday, April 2, 2011

पांच गज़लें -कवि -संजय मासूम

कवि -संजय मासूम [जन्म -05/08/1965]
जिस जनपद की पवित्र मिट्टी में राही मासूम रजा ,कुबेरनाथ राय ,विवेकी राय ,उमाशंकर तिवारी और अमरनाथ श्रीवास्तव जैसे नामचीन लेखक और कवि पैदा हुए ,उसी मिट्टी में जन्में हैं हिन्दी के सुपरिचित गज़लकार भाई संजय मासूम |जी हाँ यह वही संजय मासूम हैं , जिन्होंने कृष्  और इंडियन जैसी फिल्मों  के डायलाग लिखे हैं |हिन्दी गज़ल में संजय मासूम किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं |अपनी समकालीन सोच और कल्पना की उड़ान के बल पर संजय मासूम ने हिन्दी गज़ल में अपना एक पुख्ता मुकाम बना लिया है |इस कवि /शायर का जन्म 05 अगस्त 1965 को गाज़ीपुर जनपद [यू० पी० ]में हुआ |संजय मासूम [ वास्तविक नाम संजय कुमार श्रीवास्तव ]इलाहाबाद विश्व विद्यालय से विधि स्नातक की उपाधि हासिल कर पत्रकारिता के पेशे से  जुड़ गये |मनोरमा ,धर्मयुग और नवभारत टाइम्स से समय -समय पर जुड़े किन्तु अब मुंबई में रहकर स्वतंत्र लेखन और फिल्म लेखन कर रहे हैं |मशहूर शायर एहतराम इस्लाम कहते हैं -कोई भी व्यक्ति यदि समाज की दुखती रगों पर हाथ रखना जानता हो और अपनी अनुभूतियों को कम शब्दों में चुटीला बनाकर अभिव्यक्त करने के हुनर से वाकिफ़ हो तो उसे एक अच्छा गजलकार बनने में कुछ देर नहीं लगती और संजय मासूम में यह बातें शुरू से मौजूद थीं |प्रख्यात शायर निदा फाज़ली कहते हैं -गज़ल हर युग में जिन्दगी की हमकदम रही है |जिन्दगी के साथ इसकी चाल  और जमाल में भी मुसलसल तब्दीलियां आती रही हैं |कभी ये सूफियों की संगत में बैठी हैं कभी ये दरबारों में खुलकर खेली हैं ,कभी इसने हालत को तस्वीर किया है ,कभी उपदेशों को तहरीर किया है ....अब ये नई पीढ़ी की नाराजगी का साथ निभा रही हैं |ये नाराजगी गज़ल का नया रूप है |अपने इस नये रूप में गज़ल जिन समस्याओं से लड़ रही है वो तीसरी दुनियां की सामूहिक समस्याएं हैं ,इसके अहसास और दर्द को विकासशील देशों के साहित्यिक पैमानों से नहीं जांचा जायेगा ...इसके मूल्यांकन के लिए हमें उस आँख को रोशन करना होगा जिससे हमने कबीर और नजीर को जाना है या धूमिल और हबीब जालिब को पहचाना है ...संजय मासूम भी उसी विद्रोही पीढ़ी के गज़लकार हैं | यहीं कहीं संजय मासूम का गज़ल संग्रह है जिसकी भूमिका निदा फाज़ली ने लिखी है ,यह संग्रह 1990 में परिदृश्य प्रकाशन मुंबई से प्रकाशित हुआ है |हम इस चर्चित गज़लकार की पांच गज़लें आप तक पहुंचा रहे हैं |

चित्र -गूगल सर्च इंजन से साभार 
संजय मासूम की पांच गज़लें 
एक 

ये कैसे खौफ़ के मंजर हवा में उड़ते हैं 
हरेक सिम्त नुचे पर हवा में उड़ते हैं 

हमारा अम्न हवाओं में उड़ रहा है यों 
लहूलुहान कबूतर हवा में उड़ते हैं 

जमीं पे रहने की आदत नहीं इन्हें शायद 
यहाँ के लोग जो अक्सर हवा में उड़ते हैं 

बतायें  आपको क्या अपने शहर के हालात 
जरा सी बात पे खंजर हवा में उड़ते हैं 

पतंग और कबूतर का अब नहीं है चलन 
छतों से शाम को पत्थर हवा में उड़ते हैं 

फकत उड़ान से ऊंचाइयां नहीं मिलतीं  
कि जर्द पत्ते भी अक्सर हवा में उड़ते हैं
दो 
तनहा बैठी ,गहना कपड़ा सोच रही है 
लड़की अपनी उम्र का बढ़ना सोच रही है 

इतनी लम्बी शाख है फिर भी बे- पत्ता है 
नंगे तार पे बैठी चिड़िया सोच रही है 

नन्हें हाथ अगर गायब हैं क्यों गायब हैं 
फूल पे बैठी तितली तनहा सोच रही है 

डिग्री ,कुर्सी ,बंगला -गाड़ी ,नाती पोते 
माँ भी क्या -क्या उल्टा -सीधा सोच रही है 

गुस्से से बौराया सागर सोच रहा है 
सरिता अपना आगा पीछा सोच रही है 

तीन 
खूँ करो या रेल की पटरी उड़ाकर देख लो 
हल नहीं होंगे मसाइल आजमाकर देख लो 

रोक पाया कौन अब तक रोशनी का रास्ता 
बादलों तुम सामने सूरज के आकर देख लो 

हरहराता ये समन्दर रास्ता बन जायेगा 
तीर साधो या कोई पत्थर उठाकर देख लो 

जिस्म पर कस जायेगा ये जाल थोड़ा और भी 
ऐ परिंदों और थोड़ा फड़फड़ा कर देख लो 

चार 
बहुत ही तल्ख है मेरी जुबान ये सच है 
मैं साफगो हूँ बहुत साहिबान ये सच है 

लगे भले ही कि धरती से मिल रहा है गले 
झुका नहीं है मगर आसमान ये सच है 

ये बात और है पिघला न पायी धूप मुझे 
नहीं था सर पे मगर साएबान ये सच है 

दरख्त खा गये फल ,पी गयी नदी पानी 
ये है हमारी सदी का बयान ये सच है 

पांच 
कुछ खोना कुछ पाना चलता रहता है 
सांसों का अफसाना चलता रहता है 

नींदों वाले ख्वाबों और हकीकत में 
युद्ध यहाँ रोजाना चलता रहता है 

कुछ मिट जाते हैं तो कुछ बच जाते हैं 
वक्त का आना जाना चलता रहता है 

मंजिल -वंजिल कैसी कोई फ़िक्र नहीं 
मनमौजी दीवाना चलता रहता है 

अब भी चिड़िया चुग जाती है खेतों को 
इक दो दिन पछताना चलता रहता है 

हिंदू -मुस्लिम आते -जाते रहते हैं 
नुक्कड़ का मैखाना चलता रहता है 
[पांचवीं गज़ल को जगजीत सिंह जी ने गाया है ]