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हंगरी की डॉ.मारिया नेज्यैशी से एक खास मुलाकात
ओत्वोशलोरांद विश्वविद्यालय के भारोपीय अध्ययन विभाग तथा हंगरी में हिंदी अध्ययन पर विशेष
महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा में विदेशी हिंदी शिक्षकों के लिए आयोजित अभिविन्यास (ओरिएंटेशन) कार्यक्रम में सहभागिता करने के लिए हंगरी से आयीं डॉ. मारिया नेज्यैशी ने एक खास मुलाकात में बताया कि हंगरी में भारतीय विद्या विषय के अध्ययन-अध्यापन परंपरा की विधिवत शुरुआत 1873 ई. में ओत्वोशलोरांद विश्वविद्यालय में भारोपीय अध्ययन विभाग के अंतर्गत हुई थी। द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद संस्कृत अध्ययन-अध्यापन की पुनःनियमित रूप से शुरु कर इसका विकास करने का श्रेय विभाग के भूतपूर्व अध्यक्ष प्रो. चाबातोत्तोशि को दिया जा सकता है। हंगरी में हिंदी अध्ययन-अध्यापन का श्रीगणेश डॉ. दैबरैत्सैनी आर्पाद के प्रयासों से बीसवीं सदी के छठे दशक में हुआ था। इन्होंने विभाग में एक अंशकालिक अध्यापक के रूप में हिंदी अध्यापन का कार्य किया था। हिंदी अध्ययन-अध्यापन की परंपरा नियमित रूपाकार देकर उसे पूर्णरूप से विकसित कर वर्तमान स्वरूप देने का पूरा श्रेय डॉ. मारिया नेज्यैशी को जाता है। उन्होंने बीसवीं शताब्दी के नौवें दशक में हिंदी अध्यापन का कार्य शुरु किया था। उस समय विभाग में किसी भी भाषा में हिंदी की पाठ्य-पुस्तकें उपलब्ध नहीं थी, और तो और उस समय बुदापैश्त में हिंदी बोलनेवालों की संख्या भी नहीं के बराबर थी।
हिंदी, संस्कृत, अंग्रेजी, रूसी, लैटिन, प्राचीन यूनानी भाषा की विदूषी डॉ. नेज्यैशी कहती हैं कि 1992 ई. में भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद की ओर से ऐल्ते विश्वविद्यालय के भारोपीय अध्ययन विभाग में हिंदी के एक अतिथि प्रोफेसर की पीठ का सृजन किया गया और उपहार स्वरूप हिंदी पुस्तकें दी जाने लगीं। पीठ पर सर्वप्रथम नियुक्त हिंदी के जाने-माने साहित्यकार डॉ. असग़र वजाहत ने हिंदी के साथ-साथ उर्दू पढ़ाने का कार्य प्रारंभ किया और मारिया नेज्यैशी के साथ मिलकर हिंदी अध्यापन की पाठ्य-पुस्तक का निर्माण किया। इस परंपरा को डॉ. लक्ष्मण सिंह बिष्ट ‘बटरोही’, डॉ. रवि प्रकाश गुप्ता, डॉ. उमाशंकर उपाध्याय और डॉ. प्रमोद कुमार शर्मा ने आगे बढ़ाया। आजकल डॉ. विजया सती इस कार्य को गति दे रही हैं। निरंतर उपहार स्वरूप मिलने वाली पुस्तकों के कारण विभाग का हिंदी पुस्तकालय यूरोप का एक समृद्ध पुस्तकालय बन गया है। विभाग आशा करता है कि उसे इस तरह की पुस्तकें भविष्य में भी मिलती रहेंगी।
29 अप्रैल, 1953 ई. को हंगरी बुडापेस्ट में जन्मी डॉ. नेज्यैशी, हंगरी के ओत्वोशलोरांद विश्वविद्यालय के फैकलटी ऑफ आर्ट्स की विभागाध्यक्ष हैं वे। उन्होंने बताया कि भारोपीय अध्ययन विभाग अध्ययन-अध्यापन बोलोन्या समझौता लागू होने से पहले ऐल्ते विश्वविद्यालय भारोपीय अध्ययन (इंडोलॉजी) में पाँच वर्ष अध्ययन करने के उपरांत एम.ए. के बराबर डिप्लोमा प्रदान किया जाता था। पिछले 4-5 साल से इस व्यवस्था में परिवर्तन किया गया है। आजकल ऐल्ते विश्वद्यालय में भारोपीय अध्ययन (इंडोलॉजी) में बी.ए. स्तर का पाठ्यक्रम उपलब्ध है, जिसमें हिंदी और संस्कृत बराबर पढ़ायी जाती हैं। इसके बाद छात्र हिंदी या संस्कृत में एम.ए. के स्तर का अध्ययन कर सकते हैं।
सामान्यतः जब कोई भी छात्र बी.ए. स्तर पर अध्ययन प्रारंभ करता है तो उसका हिंदी और संस्कृत दोनों ही भाषाओँ का ज्ञान नगण्य होता है। पहले सत्र के अंत तक ये छात्र हिंदी में पढ़-लिख सकते हैं और अपने परिवार आदि से संबंधित सामान्य विषयों पर अपने विचार व्यक्त करने लगते हैं। एक वर्ष का अध्ययन करने के बाद छात्र सामान्य विषयों पर वार्तालाप करने लगते हैं और सामान्य विषयों पर छोटे-छोटे निबंध लिखने लगते हैं। साथ ही हंगेरियन भाषा से हिंदी व हिंदी से हंगेरियन भाषा में आसान वाक्यों का अनुवाद करने लगते हैं। दूसरे वर्ष के छात्र विभिन्न विषयों पर वाद-विवाद करने लगते हैं, किसी एक विषय पर अपने विचारों को समुचित ढंग से व्यक्त करने लगते हैं। जटिल विषयों पर निबंध लिखने लगते हैं। तीसरे वर्ष अर्थात् बी.ए. पाठ्यक्रम के अंतिम वर्ष के छात्र विभिन्न साहित्यिक महत्व के तथा अन्य महत्वपूर्ण विषयों पर अपने विचार सुगम रूप से हिंदी में व्यक्त करने लगते हैं। जटिल विषयों पर निबंध भी लिखने लगते हैं। साहित्यिक रचनाओं का दोनों भाषाओं में परस्पर अनुवाद करने लगते हैं।
बी.ए. स्तर के छात्रों के सामान्य अध्यापन विषयों में- वार्तालाप, हिंदी उपन्यास, हिंदी नाटक, आधुनिक हिंदी कविता के साथ-साथ कुछ नए तथा समकालीन विषयों- हिंदी मीडिया की भाषा, हंगेरियन से हिंदी में अनुवाद, निबंध लेखन, हिंदी कहानियों में स्त्री विमर्श तथा हिंदी समाज भाषाविज्ञान का अध्यापन विषयों में समावेश किया गया। डॉ.
प्रमोद कुमार शर्मा ने हंगेरियन से हिंदी में अनुवाद अध्यापन आरंभ किया और उनके परिश्रम का परिणाम यह निकला है कि विद्यार्थी प्रसिद्ध रचनाओं के साथ-साथ स्व रचित रचनाओं का भी हिंदी में अनुवाद करने लगे हैं। इस तरह की स्वअनूदित रचनाओं को हिंदी में सृजनात्मक लेखन (हंगेरियन लोगों द्वारा) की शुरुआत माना जा सकता है।
अतिथि प्राचार्यों की सहायता से एक प्रयोग के तौर पर छात्रों को कंप्यूटर का हिंदी शिक्षण में प्रयोग, कंप्यूटर पर हिंदी में टंकण करना सिखाया जाने लगा है। अब कुछ छात्र अपनी रचनाएँ व अपना गृहकार्य हिंदी में टंकित करने लगे हैं। बी.ए. में अपनी अंतिम परीक्षा के लिए ये छात्र हिंदी और संस्कृत भाषा, साहित्य, भारतीय संस्कृति का इतिहात, कला आदि से जुड़े विषयों पर तैयारियाँ करते हैं। एक और उल्लेखनीय बात यह है कि विभाग के छात्र अपने अनुसंधान पत्र (बी.ए. उपाधि प्राप्त करने के लिए आवश्यक) के लिए हिंदी भाषा और साहित्य से जुड़े विषयों का चयन करने लगे हैं। इस समय तीन छात्र हिंदी में शोधरत हैं।
एम.ए. हिन्दी के छात्र अनेक विषयों पर भारतीय लोगों की तरह हिंदी में वार्तालाप, वाद-विवाद, अपने विचार व्यक्त करने लगते हैं। एम.ए. छात्रों के विषय के रूप में भाषा विज्ञान (भारोपीय भाषा विज्ञान, तुलनात्मक भाषा विज्ञान विधियाँ, आधुनिक हिन्दी का इतिहास, हिन्दी से संबंधित अन्य भाषाएँ (ब्रज, बांगला, उर्दू, फारसी, अरबी आदि), हिन्दी साहित्य (मध्य कालीन साहित्य, आधुनिक हिन्दी गद्य, नाटक, काव्य, निबंध आदि), आशु अनुवाद व अनुवाद अभ्यास, साहित्यिक अनुवाद, भारतीय (हिन्दी) फिल्म, भारत का सांस्कृतिक इतिहास, संस्कृत भाषा, विशेष कक्षाएँ (छात्रों की रुचि के विषय) शामिल हैं।
इरास्मुस (ERASMUS) योजना के तहत विभाग के प्राध्यापक यूरोप के अन्य विश्वविद्यालयों में तथा वहाँ के प्राध्यापक विभाग में हिंदी-संस्कृत आदि से संबंधित विषयों पर व्याख्यान देने आते-जाते हैं।
विभाग में आयोजित सम्मेलन व संगोष्ठियाँ-
विभाग ने भारतीय दूतावास व आईसीसीआर, भारत सरकार के सहयोग से मार्च 2002 में हंगरी में प्रथम अंतर्राष्ट्रीय हिंदी सम्मेलन का आयोजन किया था। इसके बाद वर्ष 2007 में भी एक अंतर्राष्ट्रीय भारतीय विद्या अध्ययन सम्मलेन का आयोजन किया गया था।
भारोपीय विद्या अध्ययन विभाग ने भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद एवं भारतीय दूतावास के सहयोग से 3 से 6 फरवरी 2010 तक एक त्रिदिवसीय अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी- ‘लेटिंग द टेक्स्ट स्पीक’ (द इंपोर्टेंस ऑफ टेक्ट्चुअल स्टडीज़ इन कांटेंपरेरी इंडोलॉजी) (Letting the Texts Speak – The Importance of Textual Studies in Contemporary Indology) का आयोजन किया। संगोष्ठी का उद्घाटन भारत सरकार के केंद्रीय उद्योग एवं वाणिज्य मंत्री श्री आनंद शर्मा के भाषण से हुआ।
प्रयास- भित्तिपत्रिका-
जनवरी 2009 से विभाग में डॉ. प्रमोद कुमार के संपादकत्व में भित्ति पत्रिका“प्रयास”का प्रारंभ कराया था। पत्रिका के अंकों की खासियत हैं छात्रों द्वारा लिखी गईं आधुनिक भावबोध की हिंदी कविताएँ। इनमें अनुवाद, संस्मरण, यात्रा डायरी, कलाकृतियों व रेखाचित्रों को भी स्थान दिया गया है, इससे हंगरी भाषा के प्रसिद्ध कवियों की कविताओं और लघु कहानियों का छुट पुट रूप से अनुवाद होने में सहायता मिल रही है। अब छात्रों ने अपनी हंगेरियन रचनाओं का अनुवाद भी इसमें देना शुरु कर दिया है। पत्रिका को विभाग के वर्तमान व पूर्व अध्यापकों से पूरा सहयोग मिलता है, इस कारण से निरंतर इसके स्तर में सुधार हो रहा है। प्रयास का दसवाँ अंक आजकल डा. विजया सती के संपादन में दीवार पर लगा हुआ है। यह पत्रिका इंटरनेट पर भी उपलब्ध होने लगी। इस कार्य की शुरुआत वेब पत्रिका अभिव्यक्ति की संपादिका श्रीमती पूर्णिमा वर्मन की सहायता से की गयी है। हिंदी की वेब पत्रिका अभिव्यक्ति की टीमगत दो वर्ष से विभाग के सर्वश्रेष्ठ छात्र को पुरस्कृत करती है।
छात्रवृत्ति-
भारत सरकार भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद (आईसीसीआर) के माध्यम से विदेशों में हिंदी के प्रचार-प्रसार के लिए छात्रवृत्तियां प्रदान करती हैं। पिछले पच्चीस साल से हंगरी के कम से कम दो छात्र प्रतिवर्ष, यह छात्रवृत्ति लेकर केंद्रीय हिंदी संस्थान में हिंदी का अध्ययन करने के लिए जाते हैं। 40 से भी अधिक छात्र इस योजना का लाभ उठा चुके हैं। इस साल पहली बार यह छात्रवृत्ति लेकर 4 छात्र केद्रीय हिंदी संस्थान, आगरा में अध्ययनरत हैं।
सन 2007 में भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद ने टैगोर फैलोशिप आरंभ की थी यह भारतीय विद्या अध्ययन विभाग के लिए बहुत ही उपयोगी साबित हो रही है। विभाग के ही पूर्व छात्र डॉ हिदाश गैर्गैय और उनके बाद डॉ चाबा किश इस फैलोशिप के अंतर्गत शोध कार्य करने के साथ-साथ अध्यापन का कार्य भी करते हैं। इस अवधि में इनके अनेक शोध पत्र भी प्रकाशित हुए हैं।
दूतावास संचालित कक्षाएँ-
भारतीय दूतावास के सहयोग से तीन (वर्ष 2009 से चार) स्तरों पर हिंदी अध्यापन की सांध्यकालीन कक्षाएँ पिछले 20 वर्षों से नियमित रूप से चलती आ रही हैं। इसके दौरान गत दस वर्षों से ये कक्षाएँ भी ऐल्ते विश्वविद्यालय के प्रांगण में आयोजित की जाती थीं। बुदापैश्त में सांस्कृतिक केंद्र स्थापित हो जाने के बाद ये कक्षाएँ पुनः दूतावास में स्थानांतरित हो गयी हैं। यह तो आप अच्छी तरह समझ सकते हैं कि सप्ताह में एक दिन, घंटे-दो घंटे पढ़कर किसी विदेशी भाषा को अच्छी तरह नहीं सीखा जा सकता, पर ये कक्षाएँ और इनमें होने वाली व्याख्यानमाला (भारतीय दर्शन, इतिहास, समाज, कला, खान-पान, पहनावा आदि से संबंधित विषय पर) हंगरी वासियों की हिंदी तथा भारतीय कला और संस्कृति के अध्ययन में रुचि को बढ़ाते हैं। इन कक्षाओं में अध्ययन करने वाले अनेक युवा छात्र प्रेरित होकर भारोपीय अध्ययन विभाग में नियमित तौर पर भारतीय अध्ययन के अंतर्गत हिंदी सीखना शुरु कर देते हैं। इन कक्षाओँ के छात्र भाषा के मौखिक प्रयोग में तो दक्षता हासिल नहीं कर पाते पर वे देवनागरी में लिख पढ़ सकते हैं। पिछले 20 वर्षों से चल रही इन कक्षाओं में लगभग 1500-2000 लोग हिंदी के साथ-साथ भारत और भारतीय संस्कृति से परिचय प्राप्त कर चुके हैं। इसके अंतर्गत आयोजित व्याख्यानमाला के अंतर्गत अनेक हंगेरियन और भारतीय विद्वानों ने भारत की संस्कृति के विभिन्न पहलुओं पर प्रकाश डाला।
शिक्षणेतर गतिविधियाँ-
इण्डो यूरोपियन स्टडीज डिपार्टमेंट के विद्यार्थी प्रतिवर्ष भारत के दो प्रमुख त्योहार दीवाली व होली मनाते हैं। इन कक्षाओं में पढ़ने वाले छात्र भारोपीय विभाग के छात्रों से मिलकर प्रतिवर्ष विश्व हिंदी दिवस (या हिंदी दिवस) के अवसर पर प्रसिद्ध हिंदी कवियों की कविताओं को पाठ करते हैं व एक या दो लघु नाटकों का मंचन करते हैं। गत वर्ष छात्रों ने स्वरचित हिंदी व हंगेरियन भाषा से हिंदी में अनूदित कविताओँ का भी पाठ किया था। 2008 में अकबर बीरबल की कहानी पर आधारित“दो गधों का भार”और“आपका दास हूँ, बैंगन का नहीं” 2009 में “मेहनत की कमाई”और एक हंगारी लोक कथा“बुद्धिमान गड़रिया”के नाट्य रूपांतरों का मंचन किया गया था। 2010 में फैरेंस मोलनार के उपन्यास के एक अंश“पुटीक्लब”के नाट्य रूपांतर का मंचन किया जा रहा है। उक्त कहानियों का नाट्य रूपांतरण डॉ. प्रमोद कुमार शर्मा ने किया था। असगर वजाहत के प्रसिद्ध नाटक-जिन लाहौर नहीं वेख्या...के एक अंश भी इसी तरह मंचित किया गया था। छात्रों का अभिनय बहुत ही भावपूर्ण होता है।
दूतावास की कक्षाओं व विभाग के छात्र यू.के. हिंदी समिति द्वारा आयोजित प्रतियोगिताओं में भाग लेते हैं। सर्वप्रथम स्थान प्राप्त करने वाला छात्र भारत की यात्रा पर भी जाता है। इसप्रकार से यह कहा जा सकता है कि भारतीय संस्कृति की झलक हंगरी में हिंदी भाषा के माध्यम से बखूबी ढंग से देखने को मिलती है।
गौरतलब है कि महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा विदेशों में हिंदी अध्यापन में आ रही दिक्कतों से रू-ब-रू होने तथा पाठ्यक्रम निर्माण में एक समन्वयक की भूमिका निभा रहा है। पिछले जनवरी माह में विदेशी हिंदी अध्यापकों के लिए आयोजित अभिविन्यास कार्यक्रम में करीब आधे दर्जन से अधिक देशों के अध्यापकों ने शिरकत की थी। इसी कड़ी में दस दिनों के अभिविन्यास कार्यक्रम में मॉरीशस, श्रीलंका, हंगरी, न्यूजीलैण्ड, रूस, बेल्जियम, चीन, जर्मनी, क्रोशिया से दस अध्यापक सहभागिता कर रहे हैं। कुलपति विभूति नारायण राय ने बताया कि हम विदेश में पढ़ाने वाले हिदी अध्यापकों के लिए वर्ष में दो बार अभिविन्यास कार्यक्रम चलाएंगे जिससे हम यह जान पायेंगे कि उन्हें हिंदी के शिक्षण में क्या-क्या चुनौतियां आ रही हैं।
-अमित कुमार विश्वास


9 Comments:
डॉ.मारिया नेज्यैशी को सादर नमस्कार ,साथ ही अमित कुमार विस्वास व आपको भी .... हिंदी सेवा ,परिमार्जन में लगे मित्रों का साधुवाद ./
यह बड़ी ही अच्छी श्रंखला है, सब देशों के बारे में पता चल रहा है।
सर बहुत -बहुत आभार आपका
सर बहुत -बहुत आभार आपका
बहुत अच्छा लगा इन महोदया से मिलकर।
बहुत सारी जानकारियाँ मिलीं.
बहुत सुन्दर
डा. नेज्यैशी का विस्तृत परिचय अच्छा लगा।
बहुत सुन्दरता से आपने प्रस्तुत किया है! अच्छी एवं महत्वपूर्ण जानकारी प्राप्त हुई! धन्यवाद!
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