Friday, October 7, 2011

कमलेश द्विवेदी की ग़ज़लें

जाने माने हास्य कवि -कमलेश द्विवेदी 
सम्पर्क -09415474674
चाहे हास्य कलाकार हों या हास्य कवि बोझिल वातावरण को भी अपनी कला या काव्य कौशल से खुशनुमा बना देते हैं |लेकिन भारतीय काव्य शास्त्र और समाज में इनकी स्थिति दोयम दर्जे की ही होती है |कई बार हास्य कवियों की गम्भीर से गम्भीर कविताएँ हमारे सम्मुख नहीं आ पाती हैं |हास्य कवियों द्वारा भी गम्भीर कविताएँ लिखी जाती रही हैं ,लेकिन मंच की डिमांड के चलते हम उन रचनाओं से साक्षात्कार नहीं कर पाते हैं |भाई कमलेश द्विवेदी जी भी एक ऐसे ही कवि हैं, जो कवि सम्मेलनों में हमको अपनी धारदार और चुटीली कविताओं से हंसाने में कामयाब हो जाते हैं | देश भर में कविता पाठ करने के लिए इनको आमंत्रित किया जाता है |लेकिन कमलेश जी बाल साहित्य ,दोहे गीत लिखने के अतिरिक्त बहुत संजीदगी से ग़ज़लें भी कहते हैं |कमलेश जी लगातार विगत दो वर्षों से आई नेक्स्ट समाचार पत्र में खूब कही कालम भी लिखते हैं | इस कवि का जन्म 25 अगस्त 1960 को कानपुर में हुआ था |शिक्षा -एम० काम० ,एल०एल०बी० है |कई साझा संकलनों में रचनाएँ संकलित हैं |पत्र -पत्रिकाओं में इनकी कवितायें प्रकाशित होती रहती हैं |आकाशवाणी ,दूरदर्शन से कविता पाठ के अतिरिक्त प्राईवेट चैनल्स से भी इनकी कविताओं का प्रसारण होता रहता है |कमलेश जी कुछ वर्ष पूर्व उत्तर प्रदेश राज्य हथकरघा निगम के सहायक प्रबंधक पद से स्वैक्षिक सेवानिवृत्ति लेकर साहित्य साधना में लगे हैं |स्वभाव से सहज ,विनम्र  इस हास्य कवि की कुछ संजीदा गज़लों से आज हम आपको परिचित करा रहे हैं |
कमलेश द्विवेदी की ग़ज़लें 
एक 
हर युग में वनवास राम को सहना पड़ता है 
और सिया को भी पावक में दहना पड़ता है 

ध्रुव की तरह साधना करके देखे तो कोई 
प्रभु को उसका हाथ एक दिन गहना पड़ता है 

हरिश्चन्द्र बन जाना इतना सरल नहीं होता 
राजा को भी सेवक बनकर रहना पड़ता है 

वो चाहे दुर्योधन का हो या रावण का हो 
अहंकार के पर्वत को तो ढहना पड़ता है 

एक भागीरथ चाहे तो फिर गंगा जी को भी 
स्वर्ग छोड़कर इस धरती पर बहना पड़ता है 

प्रिय के मन में क्या है प्रियतम स्वयं समझ लेता 
क्या राधा को मोहन से कुछ कहना पड़ता है 
दो 
किसने हिम्मत हारी है 
जंग अभी तक जारी है 

आग न बुझने दी हमने 
अब भी इक चिंगारी है 

मौन नहीं साधा उसने 
यह उसकी लाचारी है 

सच्चाई   है   सच्चाई
सौ झूठों पर भारी है 

सूरज को सूरज कहना 
इसमें भी दुश्वारी है 

सबसे है अपनी यारी 
यह तो दुनियादारी है 

सोच -समझकर कुछ कहना 
कल मेरी भी बारी है 
तीन 
अपनी खुशियाँ हम बांटेंगे 
और तुम्हारे गम बांटेंगे 

जब आयेंगी मस्त बहारें 
क्या -क्या ये मौसम बांटेंगे 

तुम आँखों को आंसू दोगे 
हम गुल को सबनम बांटेंगे 

जो भी है वो देंगे सबको 
थोड़ा है कम -कम बांटेंगे  

11 Comments:

प्रवीण पाण्डेय said...

काव्य के सरल सौन्दर्य को परिभाषित करती पंक्तियाँ।

मनोज कुमार said...

हरिश्चन्द्र बन जाना इतना सरल नहीं होता
राजा को भी सेवक बनकर रहना पड़ता है
यथर्थ के धरताल पर रची ग़ज़ल।

Parul said...

bahut hi sundar rachnayen hain..

अरुण चन्द्र रॉय said...

तीनो ग़ज़ल बेहतरीन

प्रदीप कांत said...

किसने हिम्मत हारी है
जंग अभी तक जारी है

सूरज को सूरज कहना
इसमें भी दुश्वारी है

____________________

BADHIYA GAZALEIN

डॉ॰ मोनिका शर्मा said...

बेहतरीन रचनाएँ पढवाई ....आभार आपका

वीनस केशरी said...

सच्चाई है सच्चाई
सौ झूठों पर भारी है

सूरज को सूरज कहना
इसमें भी दुश्वारी है

वाह् वा
तीनो ग़ज़ल बहुत उम्दा है
यह शेर खास पसंद आये

mahendra verma said...

कमलेश द्विवेदी जी की ग़ज़लें बहुत अच्छी हैं।
सही है, हास्य कवि संजीदा रचनाएं भी लिखते हैं।

सागर said...

khubsurat rachnaaye...

Babli said...

कमलेश द्विवेदी जी की गजलें बहुत अच्छी लगी! बेहतरीन प्रस्तुती!

Arvind Mishra said...

कोई हास्य रचना भी तो होनी थी न ?