Thursday, September 22, 2011

मेरी दो ग़ज़लें

चित्र -गूगल सर्च इंजन से साभार 
 [दोनों ही ग़ज़लें पुरानी हैं लेकिन सन्दर्भ नहीं बदले हैं ]
एक 
मैं अपने दिल के आईने को धुँधलाने नहीं देता 
किसी का अक्स भी तेरे सिवा आने नहीं देता 

शहर के रहबरों में जिसका ऊँचा नाम है यारों 
हमारे जख्म हमको ही वो सहलाने नहीं देता 

हजारों बार मैं दरिया में डूबा और बच निकला 
तलातुम में तुम्हारा प्यार घबराने नहीं देता 

कभी बारिस ,कभी आंधी कभी जंगल ही जलता है 
ये मौसम अब परिंदों को कभी गाने नहीं देता 

बिछड़ने पर तुम्हारे प्यार का एहसास बरसों से 
तसव्वुर में खिले फूलों को मुरझाने नहीं देता 
दो 
धूप में झुलसा हुआ सिर धान की बाली का है 
फिर भी तुम कहते हो मंजर ये भी हरियाली का है 

इस कदर हालात से मजबूर है कव्वाल भी 
गा रहा है मर्सिया उनवान कव्वाली का है 

स्याह चेहरे हो गए खुद लालटेनों के ,यहाँ 
फिर भी दीवारों पे लिक्खा पर्व दीवाली का है 

पार्कों में पा रहे सम्मान आयातित बबूल 
पांव से रौंदा हुआ हर फूल शेफ़ाली का है 

मौसम -ए -बारिश में गर पेड़ों से चिनगारी उठी 
कुछ न कुछ तो हाथ इसमें दोस्तों माली का है 

ये न पूछो पेड़ के साये कहाँ गुम हो गये 
जब आराकश ही  पासवां हर पेड़ की डाली का है 

इश्तहारों में ही तुमने रोटियां बांटी यहाँ 
वर्ना जर्रे -जर्रे पर तो जिक्र बदहाली का है 
चित्र -गूगल से साभार 

12 comments:

  1. शहर के रहबरों में जिसका ऊँचा नाम है यारों
    हमारे जख्म हमको ही वो सहलाने नहीं देता

    कभी बारिश ,कभी आंधी कभी जंगल ही जलता है ये मौसम अब परिंदों को कभी गाने नहीं देता

    इस कदर हालात से मजबूर है कव्वाल भी
    गा रहा है मर्सिया उनवान कव्वाली का है

    वाह वा..
    तुषार जी,
    दिली दाद कबूल करें

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  2. वाह ....बेहतरीन गजल

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  3. बड़ा ही खूबसूरत एहसास।

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  4. धूप में झुलसा हुआ सिर धान की बाली का है
    फिर भी तुम कहते हो मंजर ये भी हरियाली का है

    स्याह चेहरे हो गए खुद लालटेनों के ,यहाँ
    फिर भी दीवारों पे लिक्खा पर्व दीवाली का है

    ये न पूछो पेड़ के साये कहाँ गुम हो गये
    जब आराकश ही पासवां हर पेड़ की डाली का है

    इश्तहारों में ही तुमने रोटियां बांटी यहाँ
    वर्ना जर्रे -जर्रे पर तो जिक्र बदहाली का है

    ____________________


    बढिया ग़ज़लें

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  5. अत्यंत खूबसूरत अभिव्यक्ति ,तुषारजी.......

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  6. आप एक बार में एक ही ग़ज़ल पोस्ट किया करें। इससे दूसरे का महत्व छिप जाता है। दूसरी ग़ज़ल यहां क्लासिकाल लगी। इतनी अच्छी ग़ज़ल ब्लॉगजगत में एकाध ही पढ़ी होगी। हर शे’र लाजवाब है। गहरे अर्थ को प्रेषित करती हुई।

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  7. आदरणीय भाई मनोज जी सादर प्रणाम |पुरानी ग़ज़लें थीं इसलिए एक साथ लगा दिया |मैं आपके बेशकीमती सुझाव से सहमत हूँ |

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  8. पार्कों में पा रहे सम्मान आयातित बबूल
    पांव से रौंदा हुआ हर फूल शेफ़ाली का है


    हर गुणी की पीड़ा उकेर दी आपने …

    इश्तहारों में ही तुमने रोटियां बांटी यहाँ
    वर्ना जर्रे-जर्रे पर तो जिक्र बदहाली का है

    अवाम और हुकूमत का यथार्थ …


    नमन है आदरणीय बंधुवर तुषार जी आपकी लेखनी को !

    पहली ग़ज़ल भी अच्छी है -
    कभी बारिश , कभी आंधी ; कभी जंगल ही जलता है
    ये मौसम अब परिंदों को कभी गाने नहीं देता

    आपका सृजन सुकून देता है …

    पुनः हार्दिक बधाई एवं मंगलकामनाएं !
    - राजेन्द्र स्वर्णकार

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  9. JaiKrishnaji...

    एक मैं अपने दिल के आईने को धुँधलाने नहीं देता
    किसी का अक्स भी तेरे सिवा आने नहीं देता
    definitely shows loyalty in love and deep love.

    This is a beautiful ghazal and the picture chosen from google perfect for these feelings.

    Bahut jyada sundar rachna....padkar bahut achcha laga.

    -Shaifali
    http://guptashaifali.blogspot.com

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  10. इश्तहारों में ही तुमने रोटियां बांटी यहाँ
    वर्ना जर्रे -जर्रे पर तो जिक्र बदहाली का है

    बहुत खूब...

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  11. दोनों गज़लें बहुत खूबसूरत ..


    हजारों बार मैं दरिया में डूबा और बच निकला
    तलातुम में तुम्हारा प्यार घबराने नहीं देता

    वाह क्या बात है ..


    स्याह चेहरे हो गए खुद लालटेनों के ,यहाँ
    फिर भी दीवारों पे लिक्खा पर्व दीवाली का है
    यह भी विडम्बना ही है ..

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