Friday, August 5, 2011

एक गीत -मौसमों के आधीन रहे

चित्र -गूगल से साभार 
मौसमों के आधीन रहे 
सूखा हो 
या बाढ़ 
मौसमों  के आधीन रहे |
मेघदूत 
अब खेतों की 
हरियाली छीन रहे |

परजा का दुःख 
भूले आये कितने 
राजा -रानी ,
आदमखोर 
व्यवस्था की 
कुछ बदली नहीं कहानी ,
आजादी के 
सपने 
कागज पर रंगीन रहे |

इंदर राजा 
राजसभा में 
मुजरे देख रहे ,
मौन सभासद 
अपनी -अपनी 
रोटी सेंक रहे ,
हम महलों के 
कचराघर में 
कूड़ा  बीन रहे |

आंधी -पानी 
तेज हवा के 
झोंकों से लड़ते ,
हम हारिल 
पंजे में सूखी 
टहनी ले उड़ते ,
आराकश 
बस पेड़ 
काटने में तल्लीन रहे |

मेले -हाट 
प्रदर्शनियाँ सब 
शहरों के हिस्से ,
भूखे पेट 
कहाँ तक सुनते 
अम्मी के किस्से ,
अपनी दुआ 
कुबूल कहाँ 
उनकी आमीन रहे |

22 comments:

  1. हम महलों के
    कचराघर में
    कूडे बीन रहे .

    ग़ज़ब की लयात्मकता,भाव और कथ्य.
    बधाई इस सुन्दर गीत के लिए.

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  2. मेले -हाट
    प्रदर्शनियाँ सब
    शहरों के हिस्से ,
    भूखे पेट
    कहाँ तक सुनते
    अम्मी के किस्से ,
    अपनी दुआ
    कुबूल कहाँ
    उनकी आमीन रहे |

    एक सम्यक और प्रभावशाली रचना के लिए आपका आभार

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  3. मेले -हाट
    प्रदर्शनियाँ सब
    शहरों के हिस्से ,
    भूखे पेट
    कहाँ तक सुनते
    अम्मी के किस्से ,
    अपनी दुआ
    कुबूल कहाँ
    उनकी आमीन रहे |

    वाह ....बहुत बढ़िया....पंक्तियाँ बेमिसाल हैं...

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  4. परजा का दुःख
    भूले आये कितने
    राजा -रानी ,
    आदमखोर
    व्यवस्था की
    कुछ बदली नहीं कहानी ,
    आजादी के
    सपने
    कागज पर रंगीन रहे |

    So true !

    Mesmerizing creation !

    .

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  5. यथार्थ और प्रासंगिक रचना ...

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  6. आजादी के
    सपने
    कागज पर रंगीन रहे |

    सच्ची सटीक बात...लाजवाब रचना...बधाई स्वीकारें.

    नीरज

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  7. बहुत ख़ूबसूरत रचना लिखा है आपने! हर एक शब्द दिल को छू गई! उम्दा प्रस्तुती!
    मेरे नए पोस्ट पर आपका स्वागत है-
    http://seawave-babli.blogspot.com/
    http://ek-jhalak-urmi-ki-kavitayen.blogspot.com/

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  8. आंधी -पानी
    तेज हवा के
    झोंकों से लड़ते ,
    हम हारिल
    पंजे में सूखी
    टहनी ले उड़ते ,
    आराकश
    बस पेड़
    काटने में तल्लीन रहे |

    खूबसूरत अभिव्यक्ति. आभार.
    सादर,
    डोरोथी.

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  9. बेहतरीन प्रस्तुति।

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  10. मानवीय मूल्यों के अवमूल्यन को मौसमों के अधीन हो रहे बिम्ब पर प्रवाहित यह गीत मन को बहुत झकझोड़ता है।

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  11. इंदर राजा
    राजसभा में
    मुजरे देख रहे ,
    मौन सभासद
    अपनी -अपनी
    रोटी सेंक रहे ,
    हम महलों के
    कचराघर में
    कूडे बीन रहे |

    तुषार जी लाजवाब कर दिया आपने

    laajavaa

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  12. आराकश
    बस पेड़
    काटने में तल्लीन रहे |

    बहुत ही शानदार नवगीत तुषार जी| बधाई|

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  13. बहुत सुन्दर एवं मर्मस्पर्शी रचना !
    हार्दिक शुभकामनायें !

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  14. आंधी -पानी
    तेज हवा के
    झोंकों से लड़ते ,
    हम हारिल
    पंजे में सूखी
    टहनी ले उड़ते ,
    आराकश
    बस पेड़
    काटने में तल्लीन रहे ...

    Excellent creation ! nicely expressed .

    .

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  15. आंधी-पानी
    तेज हवा के
    झोंकों से लड़ते
    हम हारिल
    पंजे में सूखी
    टहनी ले उड़ते
    आराकश
    बस पेड़
    काटने में तल्लीन रहे ।

    भावपूर्ण नवगीत कुछ संदेश भी दे रहा है।
    बढ़िया रचना।

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  16. आजादी के
    सपने
    कागज पर रंगीन रहे |

    सहज भाषा में देश पर हावी मौसम का बयां...अच्छा लगा...

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  17. इंदर राजा
    राजसभा में
    मुजरे देख रहे ,
    मौन सभासद
    अपनी -अपनी
    रोटी सेंक रहे ,
    हम महलों के
    कचराघर में
    कूड़ा बीन रहे |

    bahut badhiyaa

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  18. समकालीनता लबरेज है कविता में

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  19. मेरे नए पोस्ट पर आपका स्वागत है-
    http://seawave-babli.blogspot.com

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