Monday, August 1, 2011

सावन के रंग कैलाश गौतम के दोहों के संग

कवि -कैलाश गौतम 
समय -[08/01/1944-06/12/2006]
काव्य प्रेमियों के मानस को अपनी कलम और वाणी से झकझोरने वाले जादुई कवि का नाम है 'कैलाश गौतम'। जनवादी सोच और ग्राम्य संस्कृति का संवाहक यह कवि दुर्भाग्य से अब हमारे बीच नहीं है। आकाशवाणी इलाहाबाद से सेवानिवृत्त होने के बाद तत्कालीन उत्तर प्रदेश सरकार ने कैलाश गौतम को आजादी के पूर्व स्थापित हिन्दुस्तानी एकेडेमी के अध्यक्ष पद पर मनोनीत किया। एकेडेमी के अध्यक्ष पद पर रहते हुए इस महान कवि का 9 दिसम्बर 2006 को निधन हो गया। कैलाश गौतम को अपने जीवनकाल में पाठकों और श्रोताओं से जो प्रशंसा या ख्याति  मिली वह दशकों बाद किसी विरले कवि को ही  नसीब होती है। कैलाश गौतम जिस गरिमा के साथ हिन्दी कवि सम्मेलनों का संचालन करते थे उसी गरिमा के साथ कागज पर अपनी कलम को धार देते थे। 8 जनवरी 1944 को बनारस के डिग्घी गांव (अब चन्दौली) में जन्मे इस कवि ने अपना कर्मक्षेत्र चुना प्रयाग को। इसलिए कैलाश गौतम के स्वभाव में काशी और प्रयाग दोनों के संस्कार रचे-बसे थे। जोड़ा ताल, सिर पर आगतीन चौथाई आन्हर, कविता लौट पड़ी  बिना कान का आदमी  आदि प्रमुख काव्य कृतियां हैं जो कैलाश गौतम को कालजयी बनाती हैं। जै-जै सियाराम, और 'तम्बुओं का शहर' जैसे महत्वपूर्ण उपन्यास अप्रकाशित रह गये। 'परिवार सम्मान', प्रतिष्ठित ऋतुराज सम्मान और मरणोपरान्त तत्कालीन उत्तर प्रदेश सरकार ने कैलाश गौतम को 'यश भारती सम्मान' (राशि पांच लाख रुपये) से  सम्मानित किया था |अमौसा क मेला, कचहरी और गांव गया था गांव से भागा कैलाश गौतम की सर्वाधिक लोकप्रिय रचनाएं हैं। आज कैलाश गौतम के कुछ सावन कुछ प्रेम और कुछ मौसम के रंग में डूबे दोहे आपके समक्ष सादर अवलोकनार्थ प्रस्तुत हैं 
कैलाश गौतम के कुछ सावनी  दोहे 
सावन की झिर -झिर हवा ,देह तोड़ता ताल 
तनी रही जो झुक गयी ,वो कदम्ब की डाल 

मेघ घिरे पानी गिरा ,निखरे पेड़ -पहाड़ 
ऐसे में बज्जर हुए ,खुलते नहीं किवाड़ 

कैसा सहज मिठास है ,अद्भुत है संवाद 
सदा रहेंगे याद ये मन्दिर और प्रसाद 

घटा सलोनी -साँवली ,ये लहराता ताल 
दोनों ही कह -सुन रहे ,अपना -अपना हाल 

धान उगे है खेत में ,फैला धानी रंग 
झिर -झिर -झिर बौछार में ,रेशम लिपटा अंग 

जल को छूना होंठ से ,और फूल से देह 
दर्पण -दर्शन की तरह ,अद्भुत है ये नेह 

जल्दी में संकेत भी जल्दी में संवाद 
अभी कानपुर ,लखनऊ अभी इलाहबाद 

दिन डूबा सूरज गया ,किस्सा हुआ तमाम 
अँजुरी में दीपक लिए ,घर -घर पहुंची शाम 

धान बुलाते शान से ,देते हाथ सिवान 
घर की चौखट पर खड़ी ,गोरी तोड़े तान 

मन का सौदा हो गया ,ऐसा बिना हिसाब 
सिरहाने उलटी पड़ी ,देखो खुली किताब 

दफ़्तर में बादल घिरे ,रस्ते में बरसात 
सूने घर को क्या कहें ,नींद न आयी रात 

अंगिया छोटी हो गयी ,लगे टूटने बंद 
कहाँ तुम्हारे स्वर पिया कहाँ हमारे छंद 

ये बजरे की चाँदनी ये गंगा की धार 
भीतर -भीतर टीसता पहला -पहला प्यार 

आँख खुली मौसम खुला ,खुले खेत के खेत 
खुलते -खुलते रह गए ,बंधे -बंधे संकेत 

आकर्षण की छाँह में ,लाज -शील -संकोच 
प्यासी चिड़िया खोलती ,रह -रह जैसे चोंच 

इन्द्रधनुष जब से गए ,तब से हुआ न खेल 
खेत न फूटीं क्यारियाँ ,छप्पर चढ़ी न बेल 


मन बदला ,बदली दशा ,बदले खेत कछार 
कन्धे पर उत्सव लिए उतरा है त्यौहार 


नया -नया है डाकिया ,पूछ रहा है नाम 
क्या जाने केसर गली किसकी नींद हराम 


लट बिखरी आंचल उड़ा ,खुले नदी के द्वीप 
पारे जैसी कांपती और हाँफती सीप 


अँजुरी में जूड़ा खुला ,साँसों बसी सुवास 
संयम धोखा दे गया ,टूट गया उपवास 


हंसी ,चिकोटी, गुदगुदी ,चितवन छुवन ,लगाव 
सीधी -सादी राह में ये हैं ,मधुर पड़ाव 
चित्र -गूगल सर्च इंजन से साभार 

14 comments:

  1. बहुत सुंदर दोहे।

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  2. कैलाश गौतम साहब के सावनी दोहे पढ़कर मन प्रसन्न हो गया पढ़वाने के लिए आभार

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  3. कैलाश जी को पढवाने के लिए शुक्रिया...

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  4. प्रकृति का उद्दात्त चित्रण।

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  5. कैलाश जी लोक विधा के चतुर चितेरे थे -आभार उनकी याद के लिए

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  6. वाह, आनंद आ गया तुषार जी| अनेकों दोहे दिल में उतरने की सामर्थ्य रखते हैं| जय हो| आद. कैलाश गौतम जी तक हमारा नमन पहुंचाने की कृपा करिएगा सर|

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  7. कैलाश गौतम जी के दोहे पढ़कर मन प्रफुल्लित हो उठा! सारे दोहे एक से बढ़कर एक है! उनके दोहे पढ़वाने के लिए आभार!

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  8. धान उगे है खेत में ,फैला धानी रंग
    झिर -झिर -झिर बौछार में ,रेशम लिपटा अंग ..

    Great collection .

    .

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  9. कैलाश गौतम के कुछ सावनी दोहे पढ़ कर आनंद आ गया ....

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  10. कैलाश जी की सुंदर रचना पढवाई आभार

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