Thursday, July 14, 2011

एक राष्ट्रगीत -आखिर कब तक?

मुंबई [भारत ]चित्र गूगल से साभार 
आखिर कब तक ?
सत्य -अहिंसा के 
सीने पर वार सहेंगे 
आखिर कब तक ?
हत्यारों का 
इस धरती पर भार सहेंगे 
आखिर कब तक ?

इन्द्रधनुष सी 
सजी  मुंबई जागी 
मगर कराह रही है ,
कठपुतली 
सरकारों से अब 
जनता निर्णय चाह रही है ,
इन हथेलियों पर 
जलते अंगार रहेंगे 
आखिर कब तक ?

झुलस गए 
चेहरे 
दादर ,झावेरी के ,
हाथ -पांव 
फूले सतलज 
कावेरी के ,
जुहू -बीच पर 
दुश्मन के हथियार 
बहेंगे आखिर कब तक ?

घर से 
दफ्तर तक जाना 
आसान नहीं है ,
साथ सुरक्षा का 
कोई 
सामान नहीं है ,
हम बनकर के 
बालू की मीनार 
ढहेंगे आखिर कब तक ?

भ्रष्टाचार 
ओढ़कर प्रहरी 
आँख मूंदकर दिन में सोये ,
हम अपने 
पैरों के नीचे 
अपने हाथों कंकड़ बोये ,
दुश्मन के 
सम्मुख हम सब लाचार 
रहेंगे आखिर कब तक ?

11 comments:

  1. समय की आहटों को आपके कवि मन ने बहुत तीव्रता से सुना है तभी तो कल की हुई घटना को आपने इस कविता में दर्ज किया है ।

    समाज में व्याप्त आतंक और अत्याचार से पैदा बेचैनी और उसके प्रति पैदा आक्रोश से शुरू हुई आपकी इस कविता का स्वर दूर तक जाता है।

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  2. भ्रष्टाचार
    ओढ़कर प्रहरी
    आँख मूंदकर दिन में सोये ,
    हम अपने
    पैरों के नीचे
    अपने हाथों कंकड़ बोये ,
    दुश्मन के
    सम्मुख हम सब लाचार
    रहेंगे आखिर कब तक ?
    दर्द जायज है, दर्द के हमदर्द संगदिल हो गए हैं , क्या मज़बूरी है ? ये तो नहीं पता / . ईमान से चोरी है ,पता है ........ प्रभावशाली रचना शुक्रिया जी /

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  3. यथार्थपरक रचना.... हार्दिक बधाई।

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  4. कोई सूरत तो नज़र आती नहीं...जब जनता ने ही गलत सही का भेद करना छोड़ दिया...तो सरकार कोई बाहर के लोगों से तो बनी नहीं है...यथा राजा, तथा प्रजा...या इसका उल्टा भी...

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  6. samay k such ko bayan karta geet mann ko jhakjhorta hai .

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  7. तिर्यक स्वर में कही गई बातें उद्वेलित करती हैं।

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  8. दर्द को उभारती हुई रचना .आह..

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  9. आप सभी का आभार जो इस कविता को पसंद किये |

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