Monday, July 11, 2011

मेरी एक गज़ल

आँखों ने जो देखा वो अफ़साना भी नहीं है 
वो यारों मोहब्बत का दीवाना भी नहीं है 

अफ़सोस परिंदे यहाँ मर जायेंगे भूखे 
इस बार किसी जाल में दाना भी नहीं है 

इक दिन की मुलाकात से गफलत में शहर है 
सम्बन्ध मेरा उससे पुराना भी नहीं है 

वो ढूढता फिरता है हरेक शै में गज़ल को 
अब मीर औ ग़ालिब का जमाना भी नहीं है 

फूलों से भरे लाँन में दीवार उठा मत 
मुझको तो तेरे सहन में आना भी नहीं है 

हर मोड़ पे वो राह बदल लेता है अपनी 
गर दोस्त नहीं है तो बेगाना भी नहीं है 

इस सुबह की आँखों में खुमारी है क्यों इतनी 
इस शहर में तो कोई मैखाना भी नहीं है 
चित्र -गूगल सर्च इंजन से साभार 

19 comments:

  1. इक दिन की मुलाकात से गफलत में शहर है
    सम्बन्ध मेरा उससे पुराना भी नहीं है
    क्या बात है ! बड़े दिनों बाद ,ओजश्वी गजल मिली पढ़ने को ,साधुवाद जी राय साहब ..../

    ReplyDelete
  2. अफ़सोस परिंदे यहाँ मर जायेंगे भूखे
    इस बार किसी जाल में दाना भी नहीं है
    अभी तो आगे पढ़ना बाक़ी है।
    क्या बात कही भाई आपने।

    ReplyDelete
  3. अद्भुत! अद्भुत!
    हम तो इसे पढ़-पढ़ कर आनंद ले रहे हैं।

    ReplyDelete
  4. हर मोड़ पे वो राह बदल लेता है अपनी
    गर दोस्त नहीं है तो बेगाना भी नहीं है

    इस सुबह की आँखों में खुमारी है क्यों इतनी
    इस शहर में तो कोई मैखाना भी नहीं है
    Wah! Kya kamaal kaa likhte hain aap!

    ReplyDelete
  5. अफ़सोस परिंदे यहाँ मर जायेंगे भूखे
    इस बार किसी जाल में दाना भी नहीं है waah

    ReplyDelete
  6. कुछ व्यस्तताओं के चलते इधर आप सभी के ब्लॉग पर आना नहीं हो सका ब्लॉग भी अपडेट नहीं कर सका मैं समझ रहा था आप सभी मुझसे नाराज होगें लेकिन आपका आशीष पाकर मैं धन्य हो गया |आभार

    ReplyDelete
  7. आदरणीय जयकृष्ण राय तुषार जी
    सादर अभिवादन !

    बहुत शानदार ग़ज़ल लिखी है हर शे'र पर दाद स्वीकार कीजिएगा ।

    अफ़सोस परिंदे यहा मर जायेंगे भूखे
    इस बार किसी जाल में दाना भी नहीं है

    बहुत अर्थ लिए है यह शे'र … क्या बात है !

    वो ढूढता फिरता है हरेक शै में गज़ल को
    अब मीर औ' ग़ालिब का जमाना भी नहीं है

    लाजवाब !

    फूलों से भरे लॉन में दीवार उठा मत
    मुझको तो तेरे सहन में आना भी नहीं है

    कुर्बान हो गया इस बेहतरीन शे'र पर तो …

    आप जितने ख़ूबसूरत नवगीत और गीत लिखते हैं , उतनी ही प्रभावशाली और पुख़्ता ग़ज़ल भी लिखते हैं ।

    संपूर्ण हृदय के साथ…
    हार्दिक बधाई और शुभकामनाएं !

    - राजेन्द्र स्वर्णकार

    ReplyDelete
  8. अफ़सोस परिंदे यहाँ मर जायेंगे भूखे
    इस बार किसी जाल में दाना भी नहीं है

    बहुत सुंदर..... प्रभावित करती उम्दा ग़ज़ल..

    ReplyDelete
  9. परिंदे वाला शेर वाक़ई आकृष्ट करता है| खूबसूरत ग़ज़ल के लिए बधाई|

    कुण्डलिया छन्द - सरोकारों के सौदे

    ReplyDelete
  10. फूलों से भरे लाँन में दीवार उठा मत
    मुझको तो तेरे सहन में आना भी नहीं है

    तुषार भाई...लाजवाब कर दिया है आपने...कमाल की ग़ज़ल...दाद कबूल अक्रें...
    नीरज

    ReplyDelete
  11. इस सुबह की आँखों में खुमारी है क्यों इतनी
    इस शहर में तो कोई मैखाना भी नहीं है ..

    बहुत खूब ... लाजवाब्शेर ही इस कमाल की गज़ल का ... मज़ा आ गया ...

    ReplyDelete
  12. बहुत ही खूबसूरत ग़ज़ल है। मत्ले के मिसरा-ए-ऊला में थोड़ी सी बहर में दिक्कत आई मुझे। २२११ २२११ २२११ २२ से एक मात्रा ज्यादा आ रही है। शानदार ग़ज़ल के लिए बधाई स्वीकार कीजिए।

    ReplyDelete
  13. अफ़सोस परिंदे यहाँ मर जायेंगे भूखे
    इस बार किसी जाल में दाना भी नहीं है .

    बहुत बढ़िया.वाह क्या बात है.
    बेहतरीन.

    ReplyDelete
  14. अफ़सोस परिंदे यहाँ मर जायेंगे भूखे
    इस बार किसी जाल में दाना भी नहीं है

    इक दिन की मुलाकात से गफलत में शहर है
    सम्बन्ध मेरा उससे पुराना भी नहीं है

    बहुत खूबसूरत शेर....

    ReplyDelete
  15. बहुत बेहतरीन ग़ज़ल तुषार भाई ....
    ..हर शेर जानदार .....धारदार...........अर्थपूर्ण

    ReplyDelete
  16. फूलों से भरे लाँन में दीवार उठा मत
    मुझको तो तेरे सहन में आना भी नहीं है

    बहुत सुन्दर ग़ज़ल... आभार और बधाई

    ReplyDelete
  17. sahaj pratik avm bimbo ka utkrastha prayog madhu ji ke geeto ki anytam visheshta he ;apne apne blog me sthan dekar bhopal ka man badhaya he meri or se unhe badhai aur apko aabhar.
    manoj jain madhur bhopal

    ReplyDelete

आपकी टिप्पणी हमारा मार्गदर्शन करेगी। टिप्पणी के लिए धन्यवाद