Friday, March 25, 2011

तीन कविताएँ -कवि -वीरेन्द्र कुमार सिंह

कवि -वीरेन्द्र कुमार सिंह
सम्पर्क -2/340 विशाल खंड ,गोमती नगर
लखनऊ  -226010
प्रशासनिक सेवा की व्यस्तताओं के बावजूद जिन कवियों /लेखकों ने निरंतर हिन्दी साहित्य को समृद्ध किया है ,उनमें वीरेंद्र कुमार सिंह का नाम भी प्रमुख है |वीरेंद्र कुमार सिंह का जन्म आज़मगढ़ शहर [उत्तर प्रदेश ]में 1 जून  1962 में  हुआ था |इलाहाबाद विश्व विद्यालय से राजनीति शास्त्र में स्नातकोत्तर उपाधि हासिल करने के बाद उत्तर प्रदेश की सिविल सेवा में चयनित हो गये |वीरेंद्र सिंह ;अप्रतिम ;पत्रिका के सम्पादक भी हैं,और इस पत्रिका के माध्यम से वीरेन्द्र सिंह जी हिन्दी साहित्य की अप्रतिम सेवा कर रहे हैं |इनकी कविताओं में गहरे भावार्थ छुपे रहते है |समकालीन बोध ,मानवीय संवेदना से इनकी कविताओं का सीधा सरोकार रहता है | अभी हाल ही में [2010]इस कवि का काव्य संग्रह :कोई शोर नहीं होता :शब्द सत्ता प्रकाशन लखनऊ से प्रकाशित हुआ है |अंतर्जाल के माध्यम से वीरेन्द्र  कुमार सिंह की तीन कविताएं हम आप तक पहुंचा रहे हैं -
चित्र -गूगल सर्च इंजन से साभार 
एक 

यह समय 
नहीं है 
रहने का तुमसे दूर 
वक्त है 
बैठकर सिरहाने 
निहारने का 
तुम्हारी तृप्त आँखें 
और बतियाने का 
तुमसे घंटों 
लेकिन 
ये दुनियादारी 
फ़िलहाल 
रोके हुए है मुझे 
पास आने से तुम्हारे 

दो 

इस शाम की 
उदासी चीरकर 
चाहता हूँ पहुंचना 
मैं तुम तक 
तुम एक 
जिसके न होने से 
हो जाती है बेजान 
पूरी जिंदगी ,
ठहर जाता है 
सब कुछ 
और छा जाती है 
एक ऐसी चुप्पी 
पूरे घर -आंगन में 
जिसे तोड़ सकती हो 
केवल तुम 

तीन
क्यों नहीं कौंधती 
कोई पंक्ति 
क्यों नहीं फूटती 
कोई कविता 
क्यों ठहर गयी है 
अभिव्यक्ति मेरी 
क्यों भूल गया हूँ 
बतियाना अपने आप से 
क्यों गायब हो गयी है 
मुट्ठियों की कसमसाहट 
जो भिंच जाती थी कभी 
देखकर जीवन की विसंगतियाँ 
क्यों जिए जा रहा हूँ 
एक घिसी -पिटी जिंदगी 
कब तक ढोता रहूँगा इसे 
जो डुबोती ही जा रही है 
एक गहरे भँवर में 
निष्क्रियता और बेबसी के 

10 comments:

  1. .

    देखकर जीवन की विसंगतियाँ
    क्यों जिए जा रहा हूँ
    एक घिसी -पिटी जिंदगी
    कब तक ढोता रहूँगा इसे
    जो डुबोती ही जा रही है
    एक गहरे भँवर में
    निष्क्रियता और बेबसी के ....

    तल्ख़ सच्चाई है इन पंक्तियों में । ह्रदय को व्यथित कर देने में सक्षम ।

    .

    ReplyDelete
  2. लेकिन
    ये दुनियादारी
    फ़िलहाल
    रोके हुए है मुझे
    पास आने से तुम्हारे

    इस दुनियादारी को देख कर हमारा मन विचलित हो जाता है और हम संवंधों की परवाह भी नहीं करते ...एक सशक्त हस्ताक्षर से रूबरू करवाकर आपने सराहनीय कार्य किया है ..आपका आभार

    ReplyDelete
  3. मैं तुम तक
    तुम एक
    जिसके न होने से
    हो जाती है बेजान
    पूरी जिंदगी ,
    ठहर जाता है
    सब कुछ
    और छा जाती है
    एक ऐसी चुप्पी
    पूरे घर -आंगन में
    जिसे तोड़ सकती हो
    केवल तुम

    सुंदर रचनाएँ..... अपनत्व और प्रेम का भाव लिए पंक्तियाँ

    ReplyDelete
  4. तीनों रचनाएँ बेहतरीन हैं. बधाई स्वीकारें

    ReplyDelete
  5. क्यों गायब हो गयी है
    मुट्ठियों की कसमसाहट
    जो भिंच जाती थी कभी
    देखकर जीवन की विसंगतियाँ ..

    मन की तल्खियों और कसमसाहट का बहुत प्रभावी चित्रण..तीनों रचनाएँ बहुत सुन्दर..

    ReplyDelete
  6. तीनो ही रचनाएँ बेहद सशक्त अभिव्यक्ति का आभास करा रही है. दूसरी कविता में बिम्ब बेहद खूबसूरोत बना है. इन मुकम्मल रचनायों के लिए सम्मानीय वीरेंद्र कुमार जी को साधुवाद ! इन सुन्दर रचनाओं से रूबरू करवाने हेतु तुषार साहब का भी शुक्रिया ! नमन !

    ReplyDelete
  7. तीनो ही कविताएं अत्यंत भावनापूर्ण हैं...
    सुन्दर अभिव्यक्ति...
    सुन्दर प्रस्तुति...

    ReplyDelete
  8. तीनों एक से बढ़कर एक.
    बढ़िया.

    ReplyDelete
  9. bahut khubsurat rachnaye ............

    ReplyDelete
  10. वीरेन्द्र कुमार सिंह जी की यह कविता दिल को छू गई -यह समय
    नहीं है
    रहने का तुमसे दूर
    वक्त है
    बैठकर सिरहाने
    निहारने का
    तुम्हारी तृप्त आँखें
    और बतियाने का
    तुमसे घंटों
    लेकिन
    ये दुनियादारी
    फ़िलहाल
    रोके हुए है मुझे
    पास आने से तुम्हारे

    ReplyDelete

आपकी टिप्पणी हमारा मार्गदर्शन करेगी। टिप्पणी के लिए धन्यवाद