Friday, March 11, 2011

साक्षात्कार -भाषा की सहजता ही रचना की सबसे बड़ी पूंजी है -कैलाश गौतम

कैलाश गौतम 
(08/01/1944 - 09/12/2006)


कैलाश गौतम से हिन्दी गीत-नवगीत पर जयकृष्ण राय 'तुषार'  की बातचीत

प्रश्न- कैलाश जी नवगीत  कब ,किन परिस्थितियों में तथा किन उद्देश्यों को लेकर अस्तित्व में आया ? नवगीत का प्रवर्तक आप किसे मानते हैं ?क्या नवगीत नामकरण उचित है?

उत्तर- नवगीत ,गीत कवियों की प्रयोगधर्मिता की ऐसी अवस्था है ,जो लगभग हर चार -पांच दशकों के अंतराल पर नया स्वरूप धारण करती है |अनुभूतियाँ और अभिव्यक्तियां नयी होती हैं और नयी होती हैं सम्वेदनाएँ |क्षण क्षण जिसमे नवीनता उत्पन्न हो वही सौंदर्य है ,कविता के साथ उसकी यही रमणीयता निरंतर बनी रहती है |आदि काल से लेकर आज तक हिन्दी कविता बराबर रमणीय होती रही है ,पुरानी पड़ती रही है ,नयी होती रही है |विकास का यह स्वाभाविक लक्षण है |बदलाव शाश्वत है |छायावाद ,रहस्यवाद,हालावाद ,प्रयोगवाद और प्रतीकवाद से छन छन कर आता हुआ रस वर्षों अपनी जमीन बनाता है फिर फूटता है पल्लव की तरह ,नए शक्ल की तरह ,नए छंद की तरह जहां निराला के गीत परम्पराएँ तोड़ते हुए नया आकार लेते हुए दिखाई देते हैं |वहीं हरिवंश राय बच्चन जी अंचल जी विद्यावती कोकिल पंडित नरेंद्र शर्मा माखनलाल चतुर्वेदी केदारनाथ अग्रवाल जैसे कुछ वाणी पुत्र गीत को अपने साथ ठहरने के लिए बाध्य भी करते हैं |गीत का यह ठहराव आज भी बड़े आदर के साथ देखा जाता है ,क्योंकि नवगीत का भाव प्रकाश इन्ही दिग्गजों की छाँह में आंख खोलता हुआ दिखाई देता है ,और धीरे धीरे वह भी समय आता है ,जब जानकी बल्लभ शास्त्री ,वीरेंद्र मिश्र ,डॉ० शम्भुनाथ सिंह ,केदारनाथ सिंह ,महेंद्र श्रीवास्तव और ठाकुर प्रसाद सिंह जैसे कवि नवगीत की पहचान बनाते हैं |नवगीत के प्रादुर्भाव में जीतना हाथ सम्वेदनशील कवियों का है उससे कहीं अधिक हाथ उन विषम और विपरीत परिस्थितियों का है ,जिनके बीच पलकर नवगीत अवतरित हुआ |पारम्परिक गीत विधा से हटकर अपनी एक और नयी  पहचान बनाने वाली नयी कविता के भाव प्रकाश का श्रेय भी प्रयाग [इलाहाबाद ]को जाता है |लेकिन गीत विधा में छंद परम्परा को जीते हुए नयेपन का हामी भरने वाले नवगीत को किसी एक स्थान और एक व्यक्ति को घेरना सचमुच अन्याय भी होगा और गलत भी |और शायद नयी कविता और गीत का बासीपन आम पाठक या श्रोता को स्वीकार नहीं था लिहाजा नवगीत जैसी विधा को जनमानस में स्वत:उतरने का अवसर मिला |रही बात इसके उदेश्य की तो जो उद्देश्य कविता का करुना से ,ममता से आदर्श से यथार्थ से और दायित्व बोध से है यही उद्देश्य नवगीत का भी इन शब्दों से है |अपने उद्देश्य में बहुत हद तक नवगीत सफल भी है |देखिये आज गीत की भाषा बदल गयी है ,गीत की चटना सार्वजनीन हो गयी है |आज गीत आम आदमी से बोलता बतियाता चलता है ,एक अच्छे मित्र की तरह एक कुलीन संस्कार की तरह ,आस्था और विश्वास से जुड़े संकल्प की तरह |असहज को  निरंतर सहज बनाये रखने वाले प्रयोग की तरह ,अगर उद्देश्य नही मरेगा तो यह नवगीत विधा भी बनी रहेगी |इसके अस्तित्व पर तुरंत कोई संकट आने वाला नहीं है |लेकिन कभी न कभी यह नयापन पुराना होगा |वैसे यह सच है आने वाले दिनों में गीत की शक्ल बदलेगी |नाम बदले या न बदले सम्भव हो तब भी लोग इसे नवगीत ही पुकारें|

प्रश्न- कविता  के फैशन में लगातार हो रहे परिवर्तन को देखकर क्या गीतकारों को भी गीतों के परिधान बदलने की जरूरत महसूस हुई?

उत्तर- तुषार जी देखिये परिवर्तन भी सार्थक तभी साबित होता है ,जब वह भीतर से होता है और अनायास होता है ,सहज होता है  और अनिवार्य भी होता है |आज के गीत की भाषा यथार्थ जिंदगी की भाषा है |उसमे खास आदमी की भी तस्वीर उभरती है और आम आदमी की भी |आम आदमी का दर्द गीतकार का दर्द है और वही दर्द उसका गीत है |गीतों के ही चलते आदमी तिथियों ,पर्वों .उत्सवों और अनेकानेक रंगारंग समारोहों में रचा बसा दिखाई दे रहा है |गीत गरीबी में साथ है ,गीत परेशानियों में साथ है ,गीत अकेले में साथ है |आंगन से खेतों तक ,बागों से पहाड़ों तक ,नहरों से कछारों तक रची बसी समूची प्रकृति का साक्षात्कार आकर्षक ढंग से यह गीत ही तो करता है |जैसा समाज होता है वैसा इसका नामकरण होता है -कहीं गीत ,कहीं नवगीत और कहीं जनवादी गीत के रूप में |राग रंग है ,मन मनुहार है ,वास्तविक पारिवारिक संघर्ष भी है सामाजिकता से प्रभावित चेतना भी है,गीत आज भी इन्कलाब पैदा करता है|

प्रश्न- क्या आंचलिकता को आप गीत की अनिवार्य शर्त मानते हैं ?गुलाब सिंह माहेश्वर  तिवारी,ठाकुर प्रसाद सिंह, अनूप अशेष और आपने अपने गीतों में आंचलिकता का भरपूर प्रयोग किया है |

उत्तर -देखिये गीत में वहाँ चार चांद लग जाते हैं ,जहां वह आंचलिकता की मिठास और सुगंध में नहाया हुआ मिलता है |आंचलिकता का वास्तविक और अनिवार्य प्रतिशत बोझिल गीत को भी सहज और स्वीकार्य बना देता है |इसका श्रेय जाता है हमारे लोकजीवन को ,हमारी लोक संस्कृति को और हमारे लोकगीतों को ||अगर ये नहीं होते तो नवगीत क्या गीत ही नहीं पैदा हुए होते |अधिकतर गीतकार पहले भी लोक संस्कृति की ही गोंद से आये थे |आज भी वही प्रतिशत सुरक्षित है ,और आगे भी रहे यही मंगल कामना है |

प्रश्न- काफी समृद्ध होते हुए भी नवगीत साहित्य में अभी स्थापित नहीं हो पाया है |क्या इसे भी साहित्य में स्थापित होने के लिए किसी नामवर सिंह की आवश्यकता है ?पाठकों की संख्या में कमी क्यों आती जा रही है?

उत्तर- अब आता हूँ आपके इस पॉइंट पर की इतने के बावजूद गीत अपनी जगह साहित्य में क्यों नहीं बना सका |इसके कुछ खास कारण हैं जिन्हें मैं गिना रहा हूँ |पहला है पत्नी बदल पर अपनी सोच मत बदल जैसे संस्कार वाले और गुट विशेष बनाकर कोल्हू के बैल की तरह बस बंधी जिंदगी जीने वाले दकियानूस और अपने समय के असफल गीतकारों ,रचनाकारों ने गुट बनाया और परस्पर एक दूसरे को प्रतिष्ठित करने कराने का बीड़ा उठाया और देश भर के प्रकाशन संस्थानों को ऐसा ख्वाब दिखाया कि सब के सब चौधिया गये और इनके कहे में आ गये और परिणाम स्वरूप गीत विरोधी गुट चारो तरफ हावी हो गया पत्र -पत्रिकाओं से लेकर प्रकाशन संस्थानों तक |ऐसे में गीत को बड़ा कड़ा संघर्ष करना पड़ा |आज का गीत इस बात का साक्षी है |लाख रुकावटें आयीं लेकिन गीत टूटा नहीं  भगा नहीं डटा रहा और संघर्ष करता रहा |पानी होकर पहाड़ तोड़ना केवल झरना जानता है | गीत पानी होकर पहाड़ में अपनी जगह बनाता रहा और बनाता रहेगा |आज आप खुद देख रहे हैं कि आज के पचास साल पहले गीत कहाँ था और आज कहाँ है ,बिना किसी खलीफा के बिना किसी मसीहा के |हाँ इतना जरूर है कि गीत कि अगर खुले मन से समीक्षा हुई होती तो गीत को और प्रोत्साहन मिला होता ,जन जन तक इसकी पहुंच और जल्दी हुई होती |गीतों के पाठक भी हैं और श्रोता भी हैं |हाँ प्रकाशक उतने उदार नहीं हैं जितना होना चाहिए |वैसे इनका व्यवहार पूरे हिन्दी साहित्य के लिए सही नहीं है |जहां कविता बड़ी सिफारिश और भारी मन से छापी जा रही हो वहाँ गीत का रोना कौन रोये |फिर भी ऐसा देखा गया है कि गीत कि किताबें छप भी रही हैं और खप भी रही हैं |लेकिन महंगी इतनी हैं कि आम आदमी जो अखबार भी चौराहे पर खड़े खड़े पढ़ने को विवश है उससे उम्मीद करें कि सौ रूपये कि हिन्दी गीत की किताब खरीदकर पढेगा ,तो ऐसा नहीं होगा |यदि सस्ते गीत संकलन निकाले जायें तो मुझे विश्वास है कि प्रतियाँ लाखों में बिकेंगी |लेकिन भाई बिल्ली के गले में घंटी कौन बांधे ?जो प्रकाशन से जुड़े लोग हैं ,वे लोग अपने पेट पर किसी को लात मरने देंगे ?कभी नहीं |बहुत महंगा पड़ेगा उनका बिरोध |पानी में रहकर मगर से बैर अच्छा नहीं मन जाता |लकिन यह भी तो है देर सबेर गीत या नवगीत जो भी कहिये इन कुचक्रों को तोडेगा और अपनी पहचान नए सिरे से बनाएगा |इसके लिए सिंह बंधुओं [नामवर सिंह और डॉ० केदार नाथ सिंह] का झोला ढोने कि जरूरत नहीं है |

प्रश्न- स्थापित  व्यंग्यकार होने के साथ -साथ आप एक प्रतिनिधि नवगीतकार हैं | आपकी अपनी निजी शैली है |क्या कारण है आप नवगीत दशक और नवगीत अर्धशती दोनों में अनुपस्थित हैं?

उत्तर- देखिये डॉ० शम्भुनाथ सिंह जैसा गीत कवि जल्दी पैदा नहीं होगा |वह जन्मजात गीतकार थे और गीत को सचमुच डॉ० साहब ने जिया है ,स्थापित किया है | इसमें कोई दो राय नहीं |लेकिन शम्भुनाथ सिंह के भीतर गीतकार के साथ -साथ एक खलीफा भी निवास करता था, और कभी कभी उनका यह खलीफा उनके गीतकार पर हावी हो जाता था तब शम्भुनाथ सिंह एकोहं द्वितीयो नास्ति कि भावना से रस बिभोर हो जाते थे और चाहते थे कि जो आसपास हैं वो इसी रस का गुणगान  करें |करने वाले करते भी थे |एक तो मैं ऐसा करने से भागता भी था दूसरे गलत संशोधन कि बुरी आदत से तंग आकर मैं अपना गीत उनसे बचाए फिरता था |इसलिए मैं जानबूझकर उनसे नहीं जुड सका |हलांकि भाई उमाशंकर तिवारी ,माहेश्वर तिवारी ,डॉ० बुद्धिनाथ मिश्र और श्रीकृष्ण तिवारी ने बहुत कहा लेकिन भाई जो बात मुझे स्वीकार नहीं उससे इस लेबल पर क्या जुड़ना |अब इसका क्या जबाब दिया जाय कि जो ड्रिंक करता है ,वह गीत नहीं लिख सकता |बाद में अपनी इस कूपमंडूकता से डॉ० साहब उबर भी आये और मेरे अग्रज कि भांति साधिकार उलाहना भी दिये |लेकिन पता नहीं क्यों जितना मुझे प्रभावित शम्भुनाथ सिंह के गीतों ने किया उसका एक बटा सौ प्रतिशत भी डॉ० साहब ने नहीं किया |हलांकि इसका मुझे मलाल भी है और खुशी भी|

प्रश्न- नयी पीढ़ी के नवगीतकारों में क्या कुछ सम्भावनाएं हैं?

उत्तर -हलांकि नए हस्ताक्षर और पैने ,पानीदार और धारदार दिखाई दे रहे हैं ,बशर्ते वे भटकें न बहकें न गीत को नारा न होने दें |उद्देश्य विशेष से जुड़ा आन्दोलन न होने दें |गीत अपना रास्ता स्वयं तय करेगा |इसके लिए गीतकार को जुलूस लेकर चलने और हटो बढ़ो मैं आ रहा हूँ कहने कि जरूरत नहीं है |कवि तो बहुत पहले से कहता आ रहा है कि हम न बोलेंगे हमारी बात बोलेगी |

प्रश्न- आप आकाशवाणी में रहते हुए कमलेश्वर, डॉ० धर्मवीर भारती, नरेश मेहता विष्णुकांत शास्त्री, रविन्द्रनाथ त्यागी दुष्यन्त, डॉ० जगदीश गुप्त, उमाकांत जी, माहेश्वर तिवारी सरीखे रचनाकारों से जुड़े रहे, और नयी पीढ़ी के रचनाकारों से भी जुड़े हैं | तब और अब में क्या फर्क  महसूस करते हैं?

उत्तर- तमाम नगरों महानगरों कि तुलना में इलाहाबाद अभी भी सम्बन्धों को जीने में बराबर आगे आगे रहता है |हलांकि यह शहर भी फ़ैल बढ़ रहा है |आँखों का पानी मरा नहीं है |व्यावसायिक दृष्टि से भले दिल्ली मुंबई ,कोलकाता महत्वपूर्ण माने जा रहे हों लेकिन यह सच है कि सार्थक प्रयोग और पहल आज भी इलाहाबाद में ही हो रहे हैं और हर स्तर पर हो रहे हैं ,कविता क्या ,कहानी क्या ,और रंगमंच क्या ?सबकी भूमिका आज दूर दूर रेखांकित हो रही है |इसका सही अंदाजा आपको पत्र -पत्रिकाओं में प्रकाशित हो रहे साहित्य से और प्रकाशित हो रही पुस्तकों से से आसानी से लग सकता है |इलाहाबाद कि मिट्टी बोलती है |उसकी खनक में एक तरह कि गमक समाई हुई है |नयी पीढ़ी बड़े सलीके से अपना रास्ता तय कर रही है और साहित्य कि हर विधा को समृद्ध करने में जी जान से जुटी है |लिखने पढ़ने के साथ -साथ जिंदगी को सही ढांचे में ढालने कि कला भी नयी पीढ़ी जानती है |उसकी उपलब्धियों को दशक दो दशक बाद तौलियेगा अभी नहीं |

प्रश्न- कैलाश जी आप लंबे समय तक आकाशवाणी इलाहाबाद से जुड़े रहे हैं |हिन्दी के विकास में आकाशवाणी का क्या योगदान रहा है ,जबकि आज आकाशवाणी में विज्ञापन बजते हैं और टी० वी० चैनलों में देह बोलती है?

उत्तर- हाँ आप सही कह रहे हैं |जब मैंने आकाशवाणी में काम करने कि शुरुआत कि थी तब बहुत अच्छा माहौल था और यही एक ऐसा माध्यम था जो सबके लिए था |सब कुछ प्रसारित होता था और सुना जाता था | आज वह बात नहीं है |इसके लिए सरकार भी जिम्मेदार है |उसी के सोच का नतीजा है आई हुई गिरावट ,जबकि अपने देश समाज के लिए इतना अच्छा दूसरा कोई माध्यम नहीं हो सकता |लेकिन अब क्या कहा जाय ?और टी० वी० चैनलों का तो कहना ही क्या ?कर्यक्रम आँख मूंदकर बना रहे हैं बनाने वाले केवल पैसा पीट रहे हैं और देखने वाले आंख फाड़कर देख रहे हैं |कार्यक्रम परोसने वालों के पास न कोई दृष्टि है न कोई सोच न ही मन |सिर्फ पैसा कमाने कि होड़ है सो वो कमा रहे हैं भुगतान तो पीढियां करेंगी तब सबकी ऑंखें खुलेंगी |अभी आंख बंद है लेकिन जब आंख खुलेगी तब तक तो बहुत कुछ स्वाहा हो चुका होगा |

प्रश्न-  आप हिन्दी भाषी क्षेत्रों से अहिन्दी भाषी क्षेत्रों तक कविता पाठ कर चुके हैं |कैसा अनुभव रहा और हिन्दी का वहाँ भविष्य क्या है?

उत्तर- अहिन्दी भाषी क्षेत्रों में बड़े मन से लोग हिन्दी की रचनाएँ सुनते और सराहते हैं ,लेकिन वहाँ भी चुटकुलेबाज और घुसपैठिए धंधा करने लगे हैं ,और सही छवि को न केवल धूमिल कर रहे हैं बल्कि मटियामेट करने पर तुले हैं |क्योंकि इस तरह के आयोजन या तो किसी गणित के आधार पर कर रहे हैं या अपने सगे सम्बन्धियों की आड़ में कर रहे हैं |दूसरी भाषा बोली वाले ऐसी हरकतों पर मुस्कराते हैं और पूछते भी हैं कि क्या यही हिन्दी है ?यह सिलसिला देश में ही नहीं विदेशों में तक चल रहा है ,फिर भी हिन्दी को विस्तार मिल रहा है |खतरों के बीच सही समीकरण बनाने कि जरूरत है|

प्रश्न- गौतम  जी आप भोजपुरी के भी बड़े कवि हैं ,इधर भोजपुरी में भी लगातार फ़िल्में बन रही हैं |क्या कभी आपको फिल्मों में गीत लेखन का प्रस्ताव मिला?

उत्तर- फिल्मों में लिखना रचनाकार होने का मानदण्ड नहीं है | भोजपुरी फिल्मों में और कैसेटों में जैसे गीत आ रहे हैं उससे भोजपुरी कि छवि खराब हो रही है |इस ओर सोचने और निर्णय लेने कि जरूरत है| क्योंकि भाषा और माँ दोनों एक सी हैं | मर्यादा पालन हमारी प्राथमिकता होनी चाहिए जैसे एक भोजपुरी फिल्म; सांच भइल सपना हमार 'में मेरे पांच गीत हैं | लेकिन ये सब स्थितियों और घटनाओं पर आधारित हैं | फिल्म बनाने वाला केवल अपना धंधा देखता है | जैसी उसकी जरूरत होती है वही वह चाहता है ,करता है और उसे वैसा लिखने वाले मिल जाते हैं |फिल्म में साहित्यिक गीत सफल नहीं हो सकते | सस्ते द्विअर्थी शब्द वहाँ बहुत माने रखते हैं | आज बाज़ार में उन्हीं कि मांग भी है |

[यह साक्षात्कार कैलाश गौतम के निधन के छह माह पूर्व लिया गया था| अक्षर पर्व और आज में प्रकाशित हुआ था| निधन के बाद नए पुराने और हिन्दुस्तानी एकेडमी पत्रिका में प्रकाशित हुआ था | यह मेरे दो साक्षात्कारों का सम्पादित अंश है]

7 comments:

  1. Bahut achha laga ye sakshatkaar...aur bhee aainda honge aisee ummeed kartee hun!

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  2. बहुत सुन्दर और ज्ञानवर्धक साक्षात्कार..आभार

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  3. अच्छा लगा कैलाशजी से मिलकर .... उन्हें नमन

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  4. unhen naman...
    saakshatkaar bahut accha hai...
    bahut-bahut dhnyawaad ise ham tak pahuchne ke liye...

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  5. साक्षात्कार नवगीत के बारे में अनेक ज्ञानवर्धक जानकारियों से भरा है ! कैलाश गौतम जी से एक बार फ़ोन पर बात करने का मुझे भी सौभाग्य प्राप्त है ! आभार !

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  6. नवगीत पर साक्षात्कार बड़े काम का है .
    कुछ लोग इसे सुविधा विधा भी कहने लगे हैं.

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  7. वाह तुषार जी,

    बहुत सधे हुए प्रश्न पूछे और कैलाश जी ने भी उतने ही नपे तुले और साफ़ सुथरे जवाब दिए, धारा प्रवाह पढ़ गया

    बहुत बहुत बधाई

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