Tuesday, March 8, 2011

तीन ग़ज़लें -कवि /शायर डॉ० जमीर अहसन

शायर -डॉ० जमीर अहसन
सम्पर्क -09335981071
रामचरित मानस जैसे लोकप्रिय ग्रन्थ का उर्दू में काव्यानुवाद करने वाले डॉ० जमीर अहसन एक अप्रतिम कवि / शायर और भारतीय संस्कृति के महान उद्गाता हैं |यह शायर हिन्दी और उर्दू कविता के बीच रामेश्वरम के सेतु की तरह है |डॉ० जमीर अहसन कबीर ,रहीम ,जायसी और रसखान की परम्परा को आगे बढाने वाले महान शायर हैं |इनकी गज़लों में कंटेंट और कहन का अंदाज बिलकुल निराला है |दूरदर्शन और आकाशवाणी से इनके कार्यक्रम प्रसारित होते रहते हैं |मुशायरों में खूबसूरती से कलाम पेश करने वाले इस शायर का कहना है कि अब  -शायरी और गज़ल की  विषय वस्तु केवल स्त्री नहीं है वरन समाज में और भी ज्वलंत मुद्दे हैं|प्रगतिशील चेतना से लैस डॉ० जमीर अहसन का जन्म 21अगस्त 1938 को कर्नलगंज इलाहाबाद में हुआ था |डॉ० जमीर अहसन का 1953 में शायरी की दुनियां में प्रवेश हुआ |तुलसी सम्मान ,त्रिवेणी सम्मान ,सारस्वत सम्मान तथा उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान के सौहार्द्र सम्मान सहित अनेकों अन्य पुरस्कारों से सम्मानित इस शायर को अभी हाल ही में भोपाल के भारत भवन में काव्य पाठ के लिए आमंत्रित किया गया था |हम इस लोकप्रिय शायर की तीन गज़लें आप तक पहुंचा रहे हैं -
     
एक 


यूँ तो वो खोटे सिक्कों से मेरी मिसाल दे 
जब टॉस जीतना हो तो मुझको उछाल दे 

अबके बरस नुजूमी हैं खामोश इसलिए 
क्यों मुस्कराते चेहरों को रंगे मलाल दे 

कांटा चुभे तो काँटों पे फिर चलके देखिये 
मुमकिन है कोई कांटा ही कांटा निकाल दे 

कब तक हवा के कंधे पे उड़ते रहेंगे लोग 
यारब इन्हें  शउरे उरूजो जवाल दे 

खुद अपने खद्दोखाल पे कुछ तबसिरा न कर 
लब सी लिए हैं मैंने मुझे इश्तेआल दे 

दो 

जब से हमने हुंकारी भरना ठेका कहना छोड़ दिया 
बाबा ने राजा रानी का किस्सा कहना छोड़ दिया 

राधा कृष्ण को सबने देखा सूरदास की आँखों से 
फिर भी किसने सूरदास को अंधा कहना छोड़ दिया 

लगने लगा है जब से टिकट आनंद भवन में जाने का 
सब बच्चों ने नेहरूजी को चाचा कहना छोड़ दिया 

क्यों मेरे परिवार की हड्डी तोड़ी जाए मेरे बाद 
मैंने बस्ती के गुंडों को गुंडा कहना छोड़ दिया 

आओ बताऊँ क्यों आता है रोज -रोज भूचाल यहाँ 
हमने इस धरती को धरती माता कहना छोड़ दिया 

तीन 

फिर से गंगा को बनाओ गंगा 
खींच लो शिव की जटाओं गंगा 

अंधे ने प्यास बुझाकर ये कहा 
एक दिन मुझको दिखाओ गंगा 

मैं कहाँ कहता हूँ तुम पापी हो 
बस यूँ ही जाओ नहाओ गंगा 

पाप तो तुमने बहाये धोये 
पापियों को भी बहाओ गंगा 
आनंद भवन इलाहाबाद -चित्र गूगल सर्च इंजन से साभार 


10 comments:

  1. राधा कृष्ण को सबने देखा सूरदास की आँखों से
    फिर भी किसने सूरदास को अंधा कहना छोड़ दिया

    इस लाजवाब शायरी को हम तक पहुंचाने का तहे दिल से शुक्रिया...यकीनन तीनो ग़ज़लें कमाल की हैं और हर शेर अपने आप में एक मिसाल...ज़मीर साहब को बन्दे का सलाम...

    नीरज

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  2. तुषार जी ... ज़मीर साहब से रूबरू करने के लिए बहुत बहुत शुक्रिया ... तीनों गजलें कमाल की हैं ... शब्द नहीं हैं तारीफ के लिए .. फिर भी अपने कुछ पसंदीदा शेर लिख रही हूँ ...


    यूँ तो वो खोटे सिक्कों से मेरी मिसाल दे
    जब टॉस जीतना हो तो मुझको उछाल दे
    अबके बरस नुजूमी हैं खामोश इसलिए
    क्यों मुस्कराते चेहरों को रंगे मलाल दे
    कांटा चुभे तो काँटों पे फिर चलके देखिये
    मुमकिन है कोई कांटा ही कांटा निकाल दे
    .... waah

    क्यों मेरे परिवार की हड्डी तोड़ी जाए मेरे बाद
    मैंने बस्ती के गुंडों को गुंडा कहना छोड़ दिया
    आओ बताऊँ क्यों आता है रोज -रोज भूचाल यहाँ
    हमने इस धरती को धरती माता कहना छोड़ दिया
    ... lajawaab


    पाप तो तुमने बहाये धोये
    पापियों को भी बहाओ गंगा
    .... bahut khoob

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  3. तीनों गजलें कमाल की हैं| धन्यवाद|

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  4. "यूँ तो वो खोटे सिक्कों से मेरी मिसाल दे
    जब टॉस जीतना हो तो मुझको उछाल दे "
    आदरणीय अहसन साहब के सभी शेर बेहद पसंद आये. तारीफ़ करने के लिये मेरे पास शब्द नहीं हैं. मन करता है कि इस विशिष्ट शायर को फेस-टु-फेस सुना जाए. कभी संयोग बना तो आपके श्रीमुख से इन रचनाओं को सुनने का सौभाग्य मिलेगा. साधुवाद. अवनीश सिंह चौहान

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  5. .

    अबके बरस नुजूमी हैं खामोश इसलिए
    क्यों मुस्कराते चेहरों को रंगे मलाल दे ...

    Awesome !

    .

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  6. मैं ज़रूरी काम में व्यस्त थी इसलिए पिछले कुछ महीनों से ब्लॉग पर नियमित रूप से नहीं आ सकी!
    बहुत ख़ूबसूरत गजलें हैं! उम्दा प्रस्तुती!

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  7. जमीर साहब की तीनों ग़ज़लें बहुत ही लाजवाब ... गहरी सामाजिकता लिए .. सच जी कहा है उन्होने आज ग़ज़लों का रूप बदल रहा है ...

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  8. राधा कृष्ण को सबने देखा सूरदास की आँखों से
    फिर भी किसने सूरदास को अंधा कहना छोड़ दिया

    लगने लगा है जब से टिकट आनंद भवन में जाने का
    सब बच्चों ने नेहरूजी को चाचा कहना छोड़ दिया

    क्यों मेरे परिवार की हड्डी तोड़ी जाए मेरे बाद
    मैंने बस्ती के गुंडों को गुंडा कहना छोड़ दिया



    तीखे प्रहार करती, सच को सच झूठ को झूठ कहती ग़ज़ल पढवाने के लिए बहुत बहुत शुक्रिया

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