Monday, March 7, 2011

एक गीत -कवयित्री पापिया हालदार

कवयित्री पापिया हालदार 
कितना कुछ होता है मन के अतल में |चेहरा कई बार दरपन होने से इनकार भी करता है ,वह बहुत कुछ छिपा ले जाता है लेकिन 'इस छिपे 'को भी भावप्रवण मन भांप लेता है ,तभी इस तरह कि काव्य पंक्तियाँ साकार होती हैं -
                                कितने दिनों के बाद मिले हो 
                                 मन का मौसम कैसा है 
महिला रचनाकारों में नवनीता देवसेन से लेकर पापिया हालदार तक एक सुदीर्घ यात्रा रेखांकित कि जा सकती है ,जिन्होंने बांग्ला भाषी होते हुए भी हिन्दी को अपनी कलम से समृद्ध किया |पापिया हालदार इलाहाबाद के महालेखाकार कार्यालय में कार्यरत एक अहिन्दी भाषी युवा कवयित्री हैं |हम उनके उत्साहवर्धन के लिए महिला दिवस पर उनका एक गीत आप तक पहुंचा रहे हैं -


कितने दिनों के बाद मिले हो 
मन का मौसम कैसा है 
चेहरे पर तो धूप खिली है 
अंदर सावन जैसा है 


कितने दिनों के बाद मिले हो 
यादों का आलम कैसा है 
कुछ भी नहीं है फिर भी कहीं 
चुभता नश्तर जैसा है 


बहुत दिनों के बाद मिले हो 
नयनों का काजल कैसा है 
मन के इन्द्रधनुष के ऊपर 
मंडराता बादल कैसा है 


बहुत दिनों के बाद मिले हो 
दिल का स्पंदन कैसा है 
मैना कैसी है मुंडेर की 
तुलसी का आंगन कैसा है 
चित्र गूगल से साभार 

2 Comments:

नीरज गोस्वामी said...

चेहरे पर तो धूप खिली है
अंदर सावन जैसा है

वाह वाह वाह...कमाल की रचना...मेरी हार्दिक बधाई स्वीकारें...

नीरज

डॉ॰ मोनिका शर्मा said...

बहुत दिनों के बाद मिले हो
दिल का स्पंदन कैसा है
मैना कैसी है मुंडेर की
तुलसी का आंगन कैसा है

बहुत सुंदर रचना ....