Wednesday, April 28, 2010

भारत-पाक मैत्री के लिए



हिन्दी में कहें या कहें उर्दू में ग़ज़ल हो
ऐ दोस्त गले मिल तो हरेक बात का हल हो


आंखों में मेरे देख तू लाहौर, कराची
जब ख़्वाब तू देखे तो वहां ताजमहल हो


तू फूल की खुश्बू का दीवाना है तो मैं भी
अब कौन चाहता है कि कांटों की फसल हो


हम भेज रहे हैं खत में गुलाबों की पंखुरियां
अब तेरा भी खत आये तो खुश्बू हो कंवल हो


तू ईद मना हम भी मना लेंगे दीवाली
जज़्बात का मसला है ये जज़्बात से हल हो


हम इससे आचमन करें या तू वजू करे
झेलम का साफ पानी हो या गंगा का जल हो


इस चांद को देखें चलो रंजिश को भुला दें
जो बात मोहब्बत की है उसपे तो अमल हो


ऐ दोस्त अगर सुबह का भूला है तो घर आ
कुछ आंख मेरी भीगें कुछ तेरी सजल हो


इक रोज तेरे घर पे तबीयत से मिलेंगे
ये धुंध हटे राह से कुछ राह सरल हो


यह गजल अक्षर पर्व 'उत्सव अंक' २००८ में प्रकाशित हो चुकी है।

Tuesday, April 6, 2010

पूरी ताकत के साथ लौट रहा है हिन्दी गीत

सुप्रसिद्ध गीत कवि यश मालवीय अपनी पत्नी आरती मालवीय के साथ 
हिन्दी कविता के लय विहीन दौर में यदि कहीं छान्द्सिकता की बांसुरी की अनुगूँज हमारे कानों तक पहुंच रही 
है तो इसका बहुत बड़ा श्रेय आज के यशस्वी गीतकवि यश मालवीय को जाता है। 'कहो सदाशिव', 'उड़ान से पहले' और 'एक चिड़िया अलगनी पर एक मन में' जैसा नवगीत संग्रह देने वाला यह कवि कथ्य, शिल्प और संवेदना के प्रति सजग रहते हुए अपनी गीत-यात्रा अनवरत जारी रखे हुए है। लोकप्रिय गीतकवि उमाकान्त मालवीय की बड़ी सन्तान होने के कारण छन्द तो इस कवि को पालने में मिला है लेकिन कवि ने इस विरासत को संभाला भी है बड़ी जिम्मेदारी के साथ। 'पहल' और 'हंस' जैसी हठधर्मी पत्रिकाओं ने भी यश मालवीय के गीतों को शिरोधार्य किया है। यह किसी साम्यवादी के मन्दिर में मत्था टेकने जैसा है। काव्यमंचों पर सुमधुर काव्यपाठ से लेकर सफल मंचसंचालन तक की कला में माहिर यश मालवीय के मन को टटोलने की कोशिश की है- जयकृष्ण राय तुषार ने-

प्रश्न - यश जी आप बहुत ही भाग्यशाली हैं क्योंकि आपकी शादी में महादेवी वर्मा जैसी कवयित्री ने शादी का कार्ड लिखा था। आपकी पत्नी आरती मालवीय को अपनी पुत्री की तरह मानती थीं। इस प्रसंग को याद कर आप कैसा महसूस करते हैं?

उत्तर - यह मेरे लिए एक रोमांचकारी अनुभव रहा। कवि पिता उमाकांत मालवीय महादेवी जी को दीदी कहा करते थे। मेरी पत्नी आरती उन्हें दीदी कहा करती थीं। इस सन्दर्भ को रखते हुए मुस्कराकर कहती थीं कि अब बताओ तुमसे मेरा क्या रिश्ता हुआ। छायावाद के प्रसिद्ध आलोचक गंगा प्रसाद पाण्डेय उनके अभिन्न थे। पाण्डेय जी के पुत्र उनके पुत्रवत सहायक रहे तथा हिन्दुस्तानी एकेडेमी के सचिव रहे। इसलिए उन्होंने कार्ड पर लिखा था कि यश और आरती के विवाह से हमारे दो आत्मीय साहित्यिक परिवार एक हो रहे हैं। कार्ड महादेवी जी के हस्तलिपि में ही छापा गया था। उनके हस्ताक्षर के साथ मुंशी प्रेमचंद के पुत्र अमृतराय का हस्ताक्षर भी था। जब मैं बारात लेकर अशोक नगर स्थित उनके आवास पर पहुंचा तो उन्होंने वत्सलभाव से अपना हाथ मेरे सिर पर रख दिया। मुझे उस क्षण लगा कि पूरी सदी का हाथ मेरे सिर पर है। उस दिन शहर में कफ्‌र्यू लगा था। स्व० रामजी पाण्डेय मेरे श्वसुर ने उस्ताद बिस्मिल्लाह खां का शहनाई वाला कैसेट लगा दिया था। कैसेट सुनते हुए वह बोली रामजी मैं बिस्मिल्लाह खां साहब का बहुत सम्मान करती हूं। उन्होंने हाशिए पर पड़े वाद्य यंत्र को केन्द्र में लाने का काम किया, लेकिन विवाह का घर तो तब लगेगा जब सामने शहनाई वाले शहनाई बजा रहे हों। तभी तो दृष्टि का उत्सव होगा। कफ्‌र्यू में भी डी०एम० को फोन कर उन्होंने चौक से शहनाई वालों को बुलवाया।

महादेवी वर्मा जी यश मालवीय के बड़े पुत्र को गोद में लिये हुए

प्रश्न- यश जी आपकी पत्नी आरती मालवीय महादेवी की गोद में खेली हैं और आप बचपन से उनसे जुड़े रहे हैं। महादेवी जी होली का त्यौहार बड़े  प्रेम भाव से उल्लास से मनाती थीं कुछ पुरानी यादें हमारे पाठकों से साझा करना चाहेंगे।
उत्तर- महादेवी जी उत्सवजीवी थी। दीपावली, जन्माष्टमी आदि पर्व उत्साह से मनाती थीं। होली की तरह ही रंगमय था उनका व्यक्तित्व। एक बार होली पर चेहरे पर लाल हरा नीला पीला रंग पोते मैं सबेरे-सबेरे उनके आवास पर पहुंच गया था। मुझे एक बारगी वह पहचान नहीं पायी्र, और जब पहचाना तो ठठाकर हंस पड़ी और बोलीं मालूम होता है कि ये सूरत-शक्ल है लड के की तो हम काहे अपनी लड की ब्याहते। रंग चलने से पहले दिन अपने प्रांगण में होलिका दहन करती थीं। राई-नमक से सबकी नजर उतारती थीं। नजर उतरवाने वालों में रामस्वरूप चतुर्वेदी, लक्ष्मीकांत वर्मा, डॉ० जगदीश गुप्त, अमृत राय, गोपीकृष्ण गोपेश, उमाकांत मालवीय, विजयदेव नारायण शाही और कैलाश गौतम जैसे लोग होते थे। एक साहित्यिक कुम्भ जैसा माहौल हो जाता था।

प्रश्न- यश जी आपके नवगीत संगह 'एक चिड़िया अलगनी पर एक मन में' को वर्ष २००७ में ऋतुराज सम्मान दिया गया। आपको कैसा लगा ?

उत्तर- सुखद आश्चर्य ऐसे समय में, जब पुरस्कारों के लिए मारकाट मची हो, लेखक आपनी स्थापना की होड  में और नीचे, और नीचे गिर रहा हो। महत्वाकांक्षाओं का दैत्य मुंह फाड  रहा हो। प्रायोजित आलोचनाओं, समीक्षाओं, पुरस्कारों, सम्मानों का दौर चल रहा हो, एक ऐसे कवि को सम्मान के लिए चुना जाना, जिसका अपना कोई खेमा नहीं है, चौंकाता ही है, खासकर जब विधा और वादकी साम्प्रदायिकता फैल रही हो। पुरस्कारों की राजनीति और राजनीति के पुरस्कारों का हड़कम्प मचा हो। सृजनात्मकता का ऐसा रेखांकन सुख देता है, क्योंकि मैं जानता हूं, पुरस्कारों के लिए पापड़  बेलनेवाले बहुत से स्वनामधन्यों को। कह सकता हूं गालिब को याद करते हुए कि 'जन्नत की हकीकत' हमें मालूम है। जन्नत को पाने के लिए लेखकों को बहुत से नरकों से गुजरना पड ता है। मुझे इस बात की सम्पूर्ण तृप्ति है कि मुझे ऐसे किसी नरक का सामना नहीं करना पड़ा। इसे मैं कवि पिता उमाकांत मानवीय का मूर्त हुआ आशीर्वाद ही मानकर चल रहा हूं।

प्रश्न- कविता, समाज और राजनीति - तीनों अराजकता के दौर से गुजर रहे हैं। फिर भी आप छन्द की मशाल मुस्तैदी से जलाये हुए आगे बढ़ रहे हैं। अभी 'हंस' पत्रिका में आपके पांच गीत प्रकाशित हुए हैं। इसे किस रूप में देखा जाय? क्या गीतों की स्वीकृति वहां भी हुई है, जो इसे कभी अछूत समझते थे?

उत्तर- कविता, समाज और राजनीति अराजकता के दौर से गुजर रहे हैं, यह कहने की जगह यदि यह कहा जाय कि संक्रमण के दौर से गुजर रहे हैं तो अधिक उपयुक्त होगा। 'हंस' में गीतों का छपना एक परिघटना है, ठीक उसी तरह जब 'पहल' में मेरे गीत छपे थे तो भी जड  आलोचनाओं के पेट में घुटने उतर गये थे। एक स्वनामधन्य युवा आलोचक ने तो यहां तक कह दिया था कि ज्ञानरंजन का दिमाग खराब हो गया है पर पाठकों और लेखकों की व्यापक प्रतिक्रिया पाकर ज्ञानरंजन जी ने भी यह 'रियलाइज' किया था कि उनसे अब तक एक लोकप्रिय और स्तरीय काव्यविधा से अन्याय होता रहा था। अब तो सभी बन्द दरवाजे खुल रहे हैं, सम्पादकों को सिर पटककर भी गीत छापने पड  रहे हैं, क्योंकि वह आम आदमी की वकालत करते हैं, और गीत की कविता आम आदमी से सीधा संवाद करती है। अब यह बात पक्की हो चुकी है।

प्रश्न- एक दौर था जब डॉ० शम्भुनाथ सिंह, ठाकुर प्रसाद सिंह, उमाकांत मालवीय, कैलाश गौतम, वीरेन्द्र मिश्र, डॉ० धर्मवीर भारती, गुलाब सिंह, माहेश्वर तिवारी, सत्यनारायण नईम, देवेन्द्र कुमार जैसे समर्थ गीतकारों की एक लम्बी फेहरिस्त थी। इनमें से कुछ सूर्य अस्त हो चुके हैं। जो शेष हैं, उनकी लौ मद्धिम हो गयी है। नयी पीढ़ी में गिने-चुने नाम हैं, जो आपकी तरह गीत की विरासत को संभाले हुए हैं। क्या होगा आने वाले कल का?

उत्तर- जिन नामों का उल्लेख आपने किया है, वह सारे गीत, कविता के उजले नक्षत्र हैं पर इनमें से एकाध को छोड  दिया जाय तो किसी ने भी गीत की अगली पीढी तैयार करने का काम नहीं किया। सब अपने में मुब्तिला रहे या फिर एक दूसरे को ही सुनाते रहे। इनमें से कितने हैं जिन्होंने गीत के लिए शम्भुनाथ सिंह की तरह गालियां तक खायी हों पर नवगीत का नारा बुलन्द किया हो। नवगीत को एक काव्यान्दोलन की शक्ल दे दी हो, साम्प्रदायिक होने की सीमा तक गीत के हिमायती रहे हो भले अतिवाद से बच न पाये हों। जो नाम आपने गिनाये, उनमें बहुतेरे तो कवि सम्मेलनों की तरफ मुड  गये। एक अकेले शम्भुनाथ जी ने नवगीत दश्कों का सम्पादन कर गीत को स्थापित करने में ऐतिहासिक भूमिका निभायी। बाकी गीतकवि तो शामिलबाजा जैसे रहे। जहां तक मेरा सवाल है, मैं और दो-चार नये गीतकवि अकेले चने की तरह भाड  फोड ने की जुर्रत कर रहे हैं। इस प्रक्रिया में मेरे साथ सुधांशु उपाध्याय जैसे कवि भी हैं। कैलाश गौतम का गीतसंग्रह भी इस बीच प्रकाशित हुआ है। नवगीत तो नहीं, अपने भविष्य के प्रति मैं आश्वस्त हूं। जाहिर है, मैं मूलतः गीत-लेखन करता हूं। मैं स्थापित होउंगा तो गीत भी नये सिरे से स्थापित होगा ही। आप जैसे प्रतिभासम्पन्न गीतकवि आ ही रहे हैं। आने वाला कल हमारा है ही, बस हमें गीत को सस्ती लोकप्रियता से बचाना होगा।

प्रश्न- गीतकवियों में एक विडम्बना है कि उनमें गद्यलेखन की या तो रुचि नहीं है या 'एकोअहं द्वितयों नास्ति' की भावना से ग्रस्त हैं, जबकि नयी कविता में एक दूसरे पर बहुत कुछ लिखा गया है।

उत्तर- गीत के पास अपना गद्य नहीं है, अपने आलोचक भी नहीं हैं। कुछ लोक लिखते भी हैं तो संस्मरणों की गली में मुड़ जाते हैं। हिन्दी गीत के पास आलोचनात्मक गद्य न होने के कारण बकौल नईम यह भी है कि गीतवाले पढ ते नहीं हैं। उन्हें समकालीनता से जुड ना चाहिए, तभी गीत को बढ  रही स्वीकार्यता को कायम रखा जा सकेगा। यह विमर्शों का समय है। स्त्री विमर्श और दलित विमर्श भी लौट रहा है। इसका प्रमुख कारण है कि गीत की स्थिति भी हिन्दी आलोचना में दलित और स्त्री जैसी ही हाशिये पर रही है।

प्रश्न- डॉ० शम्भुनाथ सिंह के प्रयासों को आप किस प्रकार देखते हैं? क्या आज भी इस प्रकार के प्रयासों की जरूरत है हिन्दी नवगीत को बचाये रखने के लिए?

उत्तर- समय एक और शम्भुनाथ की मांग कर रहा है। ऐसे समय में, जब चारों तरफ छन्द और गीतों की वापसी की बात की जा रही है, गीत को लेकर पूरी गीत बिरादरी को संघटित प्रयास करने चाहिए। गीत को कविता और गीतकार को कवि की तरह पहचान मिलेगी, तभी गीत का रचना संघर्ष कोई रूप ले सकेगा। एक बार गीतकवि रमेश रंजक ने कहा था कि गीतवाले गीत की लड़ाई कायदे से नहीं लड  रहे हैं।
इस बात पर मैंने कहा कि 'एक बेहतर गीत की रचना में बड़ी लड़ाई गीत के पक्ष में और क्या हो सकती है?' यह सुनकर उन्होंने कहा था कि यह वाक्य सुनने में अच्छा लगता है। इससे तब तक काम नहीं चलेगा, जब तक गीत की स्थापना के लिए संघटित प्रयास नहीं होगे।

प्रश्न- समकालीन गीतों / नवगीतों के कथ्य में, सोच में संवेदना के रूप में वही सब कुछ दिखता है, जो मुक्त छन्द की किसी उत्कृष्ट कविता में, फिर गीत के साथ सौतेला व्यवहार क्यो?

उत्तर- मैं अपने गीतों में समकालीन कविता का ही कथ्य छन्दबद्ध रूप में प्रस्तुत करता हूं। दुर्भाग्य यह है कि गीत आलोचक की थ्योरी और त्योरी में नहीं आते। यह बंटवारा केवल हिन्दी में हुआ है। यहां मुखय धारा का एक छद्‌म रचा गय। उर्दू में आज भी छन्द केन्द्र में है। वहां कागज और मंच का बटवारा भी नहीं है। गीतों के साथ सौतेले के व्यवहार के पीछे आलोचकों की अपनी कुण्ठा या 'काम्पलेक्स' काम करते हैं। उन्हें लगता है कि वह गीत और छन्द को महत्व देंगे तो गद्य कविता को भला कौन पूछेगा, जो एक पूरे कविता समय को ही बेसुरा बनाने पर तुली है। गीत की संवेदना और शिल्प कविता की संवेदना और शिल्प से केवल कहने के स्तर पर थोड़ा भिन्न है अन्यथा लगभग एक-सा है। बाकी अराजकता तो आलोचना के अढ तियों ने मचा रखी है मगर उनके भी दिन अब लदने वाले हैं, क्योंकि हिन्दी गीत पूरी ताकत के साथ लौट रहा है।

प्रश्न- पिता स्वर्गीय उमाकान्त मालवीय की तरह आपका मंच-संचालन बेजोड़ है और काव्य मंचों पर भी आपकी उपस्थिति है। फिर भी आपने अपने गीतों का साहित्यिक स्तर बचाये रखा है। ऐसा कैसे सम्भव हो पाता है? मंच के गिरते स्तर को कैसे रोका जा सकता है?

उत्तर- मैं साहित्यिक स्तर इसलिए बचाये रख सका, क्योंकि मैने मंच को ध्यान में रखकर कविताएं लिखी ही नहीं। जो लिखा, वही मंच पर पढ़ा। कागज और मंच की दूरी कम करने की कोशिश की। आज के मंच भांड -विदूषकों और गलेबाजों के हवाले हैं। मंच पर मैं इस तर्क से जाता हूं कि वहां जाकर कम से कम अपनी बात तो कह सकता हूं।
कवि सम्मेलन जन से जुड़ा माध्यम है। मैं लिफाफेबाज कवियों से बराबर दूरी रखता हूं। केवल पारिश्रमिक की गर्मी महसूस करते रहने से संवेदन कुन्द हो जाता है। मैंने भरत व्यास जैसे कवियों को मंच से काव्यपाठ करते देखा है। इस सन्दर्भ में मैं अपने कवि पिता उमाकान्त मालवीय को आदर्श मानता हूं।
वह एक भी लतीफा नहीं सुनाते थे और कवि सम्मेलन हिट करा ले जाते थे। मैंने कवि कैलाश गौतम जी से भी बहुत कुछ सीखा है। मंच के गिरते स्तर को सुयोग्य संचालक और सुयोग्य आयोजक ही संभाल सकता है। वैसे मुझे लगता है कि कवि सम्मेलनों के अनुसार समानान्तर सार्थक कविता का भी एक मंच बनाना चाहिए, जहां कवि सम्मेलन नहीं, कविता सम्मेलन के आयोजन हों।
जहां व्यावसायिकता की सड़ान्ध न हो। हां, कवियों का शोषण भी न हो, तम्बू और माइकवालों को मिले तो कवियों को भी उनका मानदेय मिले। सही कविता मंच पर आयेगी तो मंच का गिरता स्तर स्वतः रुक जायगा।

यश मालवीय की शादी का कार्ड जिस पर महादेवी वर्मा जी और अमृतराय जी के हस्ताक्षर हैं