Friday, October 29, 2010

एहतराम इस्लाम की गजलें




एहतराम इस्लाम

मोबाइल - 09839814279
परिचय 
हिन्दी गजल में एहतराम इस्लाम का नाम बड़े अदब से लिया जाता है। एहतराम इस्लाम का कद दुष्यन्त से बिल्कुल भी कम नहीं है। इलाहाबाद गंगा जुमना सरस्वती के संगम के लिए ही नहीं वरन गंगा जमुनी तहजीब के लिए भी जाना जाता है। उसी तहजीब के नुमाइन्दे हैं कवि / शायर एहतराम इस्लाम जो वर्तमान में इलाहाबाद प्रगतिशील लेखक संघ के अध्यक्ष भी हैं जिसके संस्थापकों में सज्जाद जहीर और मुंशी प्रेमचन्द जैसे नामचीन रचनाकार रहे हैं। 5 जनवरी 1949 को मिर्जापुर (उत्तर प्रदेश) में जन्मे एहतराम इस्लाम ने अपना कर्मक्षेत्र चुना प्रयाग को। एहतराम इस्लाम अब महालेखाकार कार्यालय के वरिष्ठ लेखा परीक्षक पद से सेवानिवृत्त हो चुके हैं। वर्ष 1965 से हिन्दी-उर्दू-अंग्रेजी की प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में एहतराम इस्लाम की रचनाएं प्रकाशित होती रही हैं। 'है तो है' इनका सुप्रसिद्ध गजल संग्रह है जिसे हिन्दुस्तानी एकेडेमी इलाहाबाद ने वर्ष 1993 में प्रकाशित किया है। एहतराम इस्लाम को उर्दू वाले अपना शायर और हिन्दी वाले अपना कवि मानते हैं। क्रांतिकारी विचारों वाला यह कवि एजी आफिस यूनियन में कई बार साहित्य मंत्री भी रह चुका है। स्वभाव से बिल्कुल विनम्र इस शायर की तीन गजलें आज हम अपने पाठकों तक पहुंचा रहे हैं और आप की प्रतिक्रियाओं का हमें इन्तजार रहेगा।

एहतराम इस्लाम की ग़ज़लें -
एक 
कतारें दीपकों की मुस्कराती हैं दिवाली में
कतारें दीपकों की मुस्कराती हैं दिवाली में।
निगाहें ज्योति का संसार पाती हैं दिवाली में।

छतें, दीवारें, दरवाजे पहन लेते हैं आभूषण,
मुंडेरें रौशनी में डूब जाती हैं दिवाली में।

अंधेरों की घुटन से मुक्ति मिल जाती है सपनों को,
फिजाएं नूर की चादर बिछाती हैं दिवाली में।

नए सपनों की चंचल अप्सराएं नृत्य करती हैं,
तमन्नाएं दिलों को गुदगुदाती हैं दिवाली में।

निराशाओं के जंगल में लगाकर आग चौतरफा,
उमीदें जिन्दगी के गीत गाती हैं दिवाली में।

नए संकल्प लेने पर सभी मजबूर होते हैं,
कुछ ऐसी भावनाएं जन्म पाती है दिवाली में।

भुला दो 'एहतराम इस्लाम' सारे-भेद-भावों को,
मेरी गजलें यही पैगाम लाती हैं दिवाली में।
दो 
मगर तुम न मेरे लिए मुस्कराये
दिवाली में घर-घर दिये मुस्कराये।
मगर तुम न मेरे लिए मुस्कराये।

किसी ने भी रोने से फुर्सत न पाई,
हमीं थे कि जब तक जिये, मुस्कराये।

तुम्हारे खयालों पे कुर्बान जाऊँ,
रदीफें खिलीं, काफिये मुस्कराये।

नजर आपकी मुफ्त बदनाम होगी,
यही सोचकर बिन पिये मुस्कराये।

चमत्कार है वक्त की करवटों का,
पहाड़ों पे बालिश्तिये मुस्कराये।

कलम के लिए क्या चुनौती होगी,
अगर कथ्य पर हाशिये मुस्कराये।

इधर आँसुओं ने झडी सी लगा दी,
उधर कागजी ताजिये मुस्कराये।

(तीन)
हाथ में मेंहदी रचाती है न काजल आंख में

दर्द की आकाश-गंगा पार करती है गजल।
कल्पनाओं के क्षितिज पर तब उभरती है गजल।

आप इतना तिलमिला उठते हैं आखिर किसलिए,
आपकी तस्वीर ही तो पेश करती है गजल।

जादुई व्यक्तित्व वाली आज भी है वह मगर,
मन में अब नश्शा नहीं आक्रोश भरती है गजल।

आइने देते हैं सम्बोधन भगीरथ का मुझे,
अवतरित होती है गंगा या उतरती है गजल।

हाथ में मेंहदी रचाती है न काजल आंख में,
मांग में अफशाँ नहीं अब धूल भरती है गजल।

जाम-ओ-पैमाना लिए फिरती रही होगी कभी,
अब तो हाथों में, लिए दर्पण गुजरती है गजल।

शान देखो वह भी सीने से लगाता है उसे,
'एहतराम इस्लाम' जिस पर वार करती है गजल।
चित्र  trekearth.com से साभार

22 comments:

  1. तुषार जी,
    एहतराम इस्लाम जी की, दीवाली के मौक़े पर, ग़ज़लें अच्छी लगीं.आप द्वारा उनकी प्रस्तुति देख कर और भी अच्छा लगा. आप भी ग़ज़लें कहते हैं,कभी मेरे ब्लॉग पर आयें.

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  2. Badhai ehtaram bhai bahut achchha kaha hai yash malviy

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  4. मैँ अपने सभी शुभचिन्तको को दीपावली की शुभकामनाएँ एहतराम इस्लाम की गजलोँ के माध्यम से दे रहा हूँ।

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  5. rai gee sabse pahale to aapko badhayi dena chahuga itanee achchhee gazalo se rubaroo hone ka awasar dene ke liye..sabhee gazale bahut hee achchhee lagee

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  6. teen bahut istreeya gazalon ke liye ahataram ji ko dhanyavad. our apko diwali ki hardik shubhkamnayen.

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  7. Very nice sir vinod gaur

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  8. Bahut sundar sir deepak chaubey

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  9. आदरणीय एहतराम इस्लाम की गजलोँ की सुन्दर प्रस्तुती पर हार्दिक बधाई , सभी पसंद आई.
    regards

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  10. islaam ji ki ghazalen vakai kamaal ki hai..jaikrishan ji aapko bhi diwali ki shubhkamnayen!

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  11. एह्तराम साहब की पुरकशिश गजलें

    वाह...

    छतें, दीवारें, दरवाजे पहन लेते हैं आभूषण,
    मुंडेरें रौशनी में डूब जाती हैं दिवाली में।

    तुम्हारे खयालों पे कुर्बान जाऊँ,
    रदीफें खिलीं, काफिये मुस्कराये।

    आप इतना तिलमिला उठते हैं आखिर किसलिए,
    आपकी तस्वीर ही तो पेश करती है गजल।

    ये शेर तो बहुत बहुत बहुत पसन्द आये

    पढवाने के लिये बहुत बहुत धन्यवाद

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  12. अंधेरों की घुटन से मुक्ति मिल जाती है सपनों को,
    फिजाएं नूर की चादर बिछाती हैं दिवाली में।

    भुल दो 'एहतराम इस्लाम' सारे-भेद-भावों को,
    मेरी गजलें यही पैगाम लाती हैं दिवाली में।

    दीपावली पर इस से बढ़कर कोई भेंट क्या हो सकती थी.धन्यवाद.

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  13. अंधेरों की घुटन से मुक्ति मिल जाती है सपनों को,
    फिजाएं नूर की चादर बिछाती हैं दिवाली में।

    नए सपनों की चंचल अप्सराएं नृत्य करती हैं,
    तमन्नाएं दिलों को गुदगुदाती हैं दिवाली में।

    ---------

    सुन्दर ग़ज़ल !

    एहतराम इस्लाम जी से परिचय कराने के लिए आभार।

    शुभ-दीपावली।

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  14. एक दीप जलता है दूसरा जलाता है।चम्पई उँगलियोँ से रोशनी सजाता है।सभी मित्रोँ शुभचिन्तकोँ को मेरी ओर से दीपावली की शुभकामनाएँ।

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  15. सुन्दर रचना। बधाई।आपको व आपके परिवार को भी दीपावली की हार्दिक शुभकामनायें।

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  16. ...खूबसूरत प्रस्तुति ..बधाई !!

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  17. इस ज्योति पर्व का उजास
    जगमगाता रहे आप में जीवन भर
    दीपमालिका की अनगिन पांती
    आलोकित करे पथ आपका पल पल
    मंगलमय कल्याणकारी हो आगामी वर्ष
    सुख समृद्धि शांति उल्लास की
    आशीष वृष्टि करे आप पर, आपके प्रियजनों पर

    आपको सपरिवार दीपावली की बहुत बहुत शुभकामनाएं.
    सादर
    डोरोथी.

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  18. aehtaram bhai ki ghazal hamesha ki tarah lajawb hai. tushar ji ko post karne ke liye badhai.

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  19. आपको एवं आपके परिवार को दिवाली की हार्दिक शुभकामनायें!

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  20. छतें, दीवारें, दरवाजे पहन लेते हैं आभूषण,
    मुंडेरें रौशनी में डूब जाती हैं दिवाली में ...

    बहुत खूब ... यूँ तो तीनो ही ग़ज़लें लाजवाब नगीना हैं .... दिवाली और उअका माहोल लाजवाब बना गिया है इन गजलों ने ...
    आपका बहुत बहुत शुक्रिया .... आपको और परिवार को दीपावली की मंगल कामनाएं ...

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  21. एहतराम साहब की गजलें माशा अल्लाह गज़ब लिखते हैं ....
    दिवाली तो नूरमय कर दी ....

    निराशाओं के जंगल में लगाकर आग चौतरफा,
    उमीदें जिन्दगी के गीत गाती हैं दिवाली में।

    बहुत खूब .....
    तुम्हारे खयालों पे कुर्बान जाऊँ,
    रदीफें खिलीं, काफिये मुस्कराये।

    क्या बात है .....


    आप इतना तिलमिला उठते हैं आखिर किसलिए,
    आपकी तस्वीर ही तो पेश करती है गजल।

    लाजवाब.....

    आपने सही लिखा एहतराम इस्लाम जी का कद दुष्यन्त से बिल्कुल भी कम नहीं है।

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  22. Priya bhai,
    Ye dekh kar bara achcha laga .. khas taur se introduction part aap ne ghazab ka likha hai ..

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