Monday, October 18, 2010

एक ग़ज़ल -मुल्क मेरा इन दिनों शहरीकरण की ओर है


ये नहीं पूछो कहां, किस रंग का, किस ओर है
इस व्यवस्था के घने जंगल में आदमखोर है

मुख्‌य सड़कों पर अंधेरे की भयावहता बढ़ी
जगमगाती रोशनी के बीच कारीडोर है

आत्महत्या पर किसानों की सदन में चुप्पियां
मुल्क मेरा इन दिनों शहरीकरण की ओर है

इन पतंगों का बहुत मुश्किल है उडना देर तक
छत किसी की, हाथ कोई और किसी की डोर है

भ्रष्ट शासन तंत्र की नागिन बहुत लंबी हुई
है शरीके जंग कुछ तो नेवला या मोर है

कठपुतलियां हैं वही बदले हुए इस मंच पर
देखकर यह माजरा दर्शक बेचारा बोर है

नाव का जलमग्न होना चक्रवातों के बिना
है ये अंदेशा कि नाविक का हुनर कमजोर है

मौसमों ने कह दिया हालात सुधरे हैं मगर
शाम-धुंधली, दिन कलंकित, रक्तरंजित भोर है

किस तरह सद्‌भावना के बीज का हो अंकुरण
एक है गूंगी पडोसन, दूसरी मुंहजोर है

नाव पर चढ ते समय भी भीड  में था शोरगुल
अब जो चीखें आ रहीं वो डूबने का शोर है।



चित्र en.beijing2008.cn से साभार

15 comments:

  1. बहुत ख़ूब लिखा है आपने...
    एक एक शेर झकझोरने वाला है..सम-सामयिक और कटु सत्य..
    बहुत ही बेहतरीन...

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  2. वाह...बहुत खूब...बेहतरीन ग़ज़ल है...बधाई स्वीकार करें।

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  3. Kya gazab likha hai aapne....har taraf doobne kaa hee shor hai...!Phir bhee eeshwar kee kripa ki,andhere me bhee raushanee kee kiran hoti to hai!

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  4. Very nice post gunjan

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  5. Bahut stromg aur dil ko chhune wali ghazal ranjana singh

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  6. नाव पर चढ ते समय भी भीड में था शोरगुल
    अब जो चीखें आ रहीं वो डूबने का शोर है।

    बढिया ग़ज़ल

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  7. बहुत ही सार्थक और सरहनीय प्रस्तुती.....शानदार ब्लोगिंग..

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  8. इन पतंगों का बहुत मुश्किल है उडना देर तक
    छत किसी की, हाथ कोई औ किसी की डोर है

    waah bahut khoobsurat sher

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  9. .

    मौसमों ने कह दिया हालात सुधरे हैं मगर
    शाम-धुंधली, दिन कलंकित, रक्तरंजित भोर है


    जबरदस्त पंक्तियाँ !

    .

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  10. बहुत ख़ूबसूरत और शानदार ग़ज़ल है! उम्दा प्रस्तुती!

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