Monday, September 20, 2010

एक कविता -कचहरी कवि -कैलाश गौतम



कवि -कैलाश गौतम
(०८-०१-१९४४ से ०९ दिसम्बर २००६)

काव्य प्रेमियों के मानस को अपनी कलम और वाणी से झकझोरने वाले जादुई कवि का नाम है 'कैलाश गौतम'। जनवादी सोच और ग्राम्य संस्कृति का संवाहक यह कवि दुर्भाग्य से अब हमारे बीच नहीं है। आकाशवाणी इलाहाबाद से सेवानिवृत्त होने के बाद तत्कालीन उत्तर प्रदेश सरकार ने कैलाश गौतम को आजादी के पूर्व स्थापित हिन्दुस्तानी एकेडेमी के अध्यक्ष पद पर मनोनीत किया। एकेडेमी के अध्यक्ष पद पर रहते हुए इस महान कवि का ९ दिसम्बर २००६ को निधन हो गया। कैलाश गौतम को अपने जीवनकाल में पाठकों और श्रोताओं से जो प्रशंसा या खयाति मिली वह दशकों बाद किसी विरले कवि को नसीब होती है। कैलाश गौतम जिस गरिमा के साथ हिन्दी कवि सम्मेलनों का संचालन करते थे उसी गरिमा के साथ कागज पर अपनी कलम को धार देते थे। ८ जनवरी १९४४ को बनारस के डिग्घी गांव (अब चन्दौली) में जन्मे इस कवि ने अपना कर्मक्षेत्र चुना प्रयाग को। इसलिए कैलाश गौतम के स्वभाव में काशी और प्रयाग दोनों के संस्कार रचे-बसे थे। जोड़ा ताल, सिर पर आग, तीन चौथाई आन्हर, कविता लौट पड ी, बिना कान का आदमी (प्रकाशनाधीन) आदि प्रमुख काव्य कृतियां हैं जो कैलाश गौतम को कालजयी बनाती हैं। जै-जै सियाराम, और 'तम्बुओं का शहर' जैसे महत्वपूर्ण उपन्यास अप्रकाशित रह गये। 'परिवार सम्मान', प्रतिष्ठित ऋतुराज सम्मान और मरणोपरान्त तत्कालीन उत्तर प्रदेश सरकार ने कैलाश गौतम को 'यश भारती सम्मान' (राशि ५.०० लाख रुपये) से इस कवि को सम्मानित किया। अमौसा क मेला, कचहरी और गांव गया था गांव से भागा कैलाश गौतम की सर्वाधिक लोकप्रिय रचनाएं हैं। आज कैलाश गौतम की कविता ''कचहरी'' हम अपने अन्तर्राष्ट्रीय / राष्ट्रीय पाठकों के साथ साझा कर रहे हैं-


कचहरी


भले डांट घर में तू बीबी की खाना
भले जैसे तैसे गिरस्ती चलाना
भले जाके जंगल में धूनी रमाना
मगर मेरे बेटे कचहरी न जाना
कचहरी न जाना कचहरी न जाना॥




कचहरी हमारी तुम्हारी नहीं है
कहीं से कोई रिश्तेदारी नहीं है
अहलमद से भी मेरी यारी नहीं है
तिवारी था पहले तिवारी नहीं है॥


कचहरी की महिमा निराली है बेटे
कचहरी वकीलों की थाली है बेटे
पुलिस के लिए छोटी साली है बेटे
यहां पैरवी अब दलाली है बेटे॥


कचहरी ही गुन्डों की खेती है बेटे
यही जिन्दगी उनको देती है बेटे
खुलेआम कातिल यहां घूमते है
सिपाही दरोगा चरण चूमते हैं॥


कचहरी में सच की बड़ी दुर्दशा है
भला आदमी किस तरह से फंसा है
यहां झूठ की ही कमाई है बेटे
यहां झूठ का रेट हाई है बेटे॥


कचहरी का मारा कचहरी में भागे
कचहरी में सोये कचहरी में जागे
मरा जी रहा है गवाही में ऐसे
हैं तावें का हण्डा सुराही में जैसे॥


लगाते बुझाते सिखाते मिलेंगे
हथेली पे सरसों उगाते मिलेंगे
कचहरी तो बेवा का तन देखती है
कहां से खुलेगा बटन देखती है॥


कचहरी शरीफों की खातिर नहीं है
उसी की कसम लो जो हाजिर नहीं है
है बासी मुंह घर से बुलाती कचहरी
बुलाकर के दिनभर रुलाती कचहरी॥


मुकदमें की फाइल दबाती कचहरी
हमेशा नया गुल खिलाती कचहरी
कचहरी का पानी जहर से भरा है
कचहरी के नल पर मुवक्किल मरा है॥


मुकदमा बहुत पैसा खाता है बेटे
मेरे जैसा कैसे निभाता है बेटे
दलालों ने घेरा सुझाया बुझाया
वकीलों ने हाकिम से सटकर दिखाया॥


धनुष हो गया हूं मैं टूटा नहीं हूं
मैं मुट्‌ठी हूं केवल अंगूठा नहीं हूं
नहीं कर सका मैं मुकदमे का सौदा
जहां था करौंदा वहीं है करौंदा॥


कचहरी का पानी कचहरी का दाना
तुम्हें लग न जाये तू बचना बचाना
भले और कोई मुसीबत बुलाना
कचहरी की नौबत कभी घर न लाना॥


कभी भूलकर भी न आंखें उठाना
न आंखें उठाना न गर्दन फंसाना
जहां पाण्डवों को नरक है कचहरी
वहीं कौरवों को सरग है कचहरी॥

3 comments:

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  2. कचहरी की महिमा निराली है बेटे
    कचहरी वकीलों की थाली है बेटे
    पुलिस के लिए छोटी साली है बेटे
    यहां पैरवी अब दलाली है बेटे॥

    कचहरी ही गुन्डों की खेती है बेटे
    यही जिन्दगी उनको देती है बेटे
    खुलेआम कातिल यहां घूमते है
    सिपाही दरोगा चरण चूमते हैं॥

    कचहरी में सच की बड़ी दुर्दशा है
    भला आदमी किस तरह से फंसा है
    यहां झूठ की ही कमाई है बेटे
    यहां झूठ का रेट हाई है बेटे॥

    आपने तो कमाल ही कर दिया...बहुत खूब...ये रचना इतनी पसंद आई कि आपका ब्लॉग फॉलो कर रही हूं...जब रचना इतनी पसंद आए तो यह तो बनता ही है...इससे पहले मैं एक गज़ल देख कर ही चली गई थी....दोबारा ब्लॉग पर लाने का शुक्रिया

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