Saturday, May 1, 2010

'गांव गया था गांव से भागा' - कवि कैलाश गौतम

कैलाश गौतम 
[08-01-1944-09-12-06]
काव्य प्रेमियों के मानस को अपनी कलम और वाणी से झकझोरने वाले जादुई कवि का नाम है 'कैलाश गौतम'। जनवादी सोच और ग्राम्य संस्कृति का संवाहक यह कवि दुर्भाग्य से अब हमारे बीच नहीं है। आकाशवाणी इलाहाबाद से सेवानिवृत्त होने के बाद तत्कालीन उत्तर प्रदेश सरकार ने कैलाश गौतम को आजादी के पूर्व स्थापित हिन्दुस्तानी एकेडेमी के अध्यक्ष पद पर मनोनीत किया। एकेडेमी के अध्यक्ष पद पर रहते हुए इस महान कवि का ९ दिसम्बर २००६ को निधन हो गया। कैलाश गौतम को अपने जीवनकाल में पाठकों और श्रोताओं से जो प्रशंसा या खयाति मिली वह दशकों बाद किसी विरले कवि को नसीब होती है। कैलाश गौतम जिस गरिमा के साथ हिन्दी कवि सम्मेलनों का संचालन करते थे उसी गरिमा के साथ कागज पर अपनी कलम को धार देते थे। ८ जनवरी १९४४ को बनारस के डिग्घी गांव (अब चन्दौली) में जन्मे इस कवि ने अपना कर्मक्षेत्र चुना प्रयाग को। इसलिए कैलाश गौतम के स्वभाव में काशी और प्रयाग दोनों के संस्कार रचे-बसे थे। जोड़ा ताल, सिर पर आग, तीन चौथाई आन्हर, कविता लौट पड ी, बिना कान का आदमी (प्रकाशनाधीन) आदि प्रमुख काव्य कृतियां हैं जो कैलाश गौतम को कालजयी बनाती हैं। जै-जै सियाराम, और 'तम्बुओं का शहर' जैसे महत्वपूर्ण उपन्यास अप्रकाशित रह गये। 'परिवार सम्मान', प्रतिष्ठित ऋतुराज सम्मान और मरणोपरान्त तत्कालीन उत्तर प्रदेश सरकार ने कैलाश गौतम को 'यश भारती सम्मान' (राशि ५.०० लाख रुपये) से इस कवि को सम्मानित किया। अमौसा क मेला, कचहरी और गांव गया था गांव से भागा कैलाश गौतम की सर्वाधिक लोकप्रिय रचनाएं हैं। आज कैलाश गौतम की कविता ''गांव गया था गांव से भागा'' हम अपने अन्तर्राष्ट्रीय / राष्ट्रीय पाठकों के साथ साझा कर रहे हैं-

गांव गया था गांव से भागा 

गांव गया था
गांव से भागा
रामराज का हाल देखकर
पंचायत की चाल देखकर
आंगन में दीवाल देखकर
सिर पर आती डाल देखकर
नदी का पानी लाल देखकर
और आंख में बाल देखकर
गांव गया था 
गांव से भागा।

गांव गया था 
गांव से भागा
 सरकारी स्कीम देखकर
बालू में से क्रीम देखकर
देह बनाती टीम देखकर
हवा में उड़ता भीम देखकर
सौ-सौ नीम हकीम देखकर
गिरवी राम रहीम देखकर
गांव गया था 
गांव से भागा।

गांव गया था
गांव से भागा
जला हुआ खलिहान देखकर
नेता का दालान देखकर
मुस्काता शैतान देखकर
घिघियाता इंसान देखकर
कहीं नहीं ईमान देखकर
बोझ हुआ मेहमान देखकर
गांव गया था
गांव से भागा।

गांव गया था
गांव से भागा
नये धनी का रंग देखकर
रंग हुआ बदरंग देखकर
बातचीत का ढंग देखकर
कुएं-कुएं में भंग देखकर
झूठी शान उमंग देखकर
पुलिस चोर के संग देखकर
गांव गया था
गांव से भागा।

गांव गया था
गांव से भागा।
बिना टिकट बारात देखकर
टाट देखकर भात देखकर
वही ढाक के पात देखकर
पोखर में नवजात देखकर
पड़ी पेट पर लात देखकर
मैं अपनी औकात देखकर
गांव गया था
गांव से भागा।

गांव गया था
गांव से भागा
नये नये हथियार देखकर
लहू-लहू त्यौहार देखकर
झूठ की जै-जैकार देखकर
सच पर पड ती मार देखकर
भगतिन का श्रृंगार देखकर
गिरी व्यास की लार देखकर
गांव गया था
गांव से भागा।

गांव गया था 
गांव से भागा
मुठ्‌ठी में कानून देखकर
किचकिच दोनों जून देखकर
सिर पर चढ़ा जुनून देखकर
गंजे को नाखून देखकर
उजबक अफलातून देखकर
पंडित का सैलून देखकर
गांव गया था
गांव से भागा।

(साभार - 'सिर पर आग' से आशु प्रकाशन इलाहाबाद)

28 comments:

  1. Thanks tusharji kailash gautam jaisa kavi kabhi kabhi he milate hain.

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  2. aaj ke gaon ki isthiti ko prakat karane wali isase achchhi koyi kavita ho hi nahi sakati.our ye sirf kailash ji ki kalam hi kar sakati hai.dhanyavad tushar.

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  3. Tushar Ji, Aapko jitna bhi Dhanyavad diya jaye kam hi rahega. Kailash ji ki is kaljayi kavita ko ek bar phir samne la kar aapne purani smritiyo ko jivit kar diya. Aasha karta hu ki aage bhi aap aisi racnao ko padhate rahenge. Badhai aur shubhkamnao ke sath. amit

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  4. papa ki is kaaljayi kavita ko sabse saajha karne ke liye dhanyavad.accha likhna/padhna/prachar karna ye teeno gur aap mein hai.'sukoon milta hai jab koi bhi accha kaam karta hai/jo auro ke liye jeeta hai jag mein naam karta HAI[SHLESH GAUTAM]

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  5. Kailash gautamji par bahut cum shabdon me likhna mushkil hai

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  6. Very nice post tusharji G B Rai

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  7. kavita parhkar gautamji ki yaadon me kho gaya.aisa laga aakashvani allahabad ke saamne chai ki dukan par baithkar bhoonja kha rahen hain aur Gobardhan bhaia kavita suna rahen hain Gaon gaya tha gaon se bhaga.thanks a lot to submit this poem on ur blog.Ashok dube Bareilly.

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  8. Bahut behtreen kavita aapne apne blog per diya hah badhai.PRIYANKA SAHU

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  9. tushar ji. Apke blog ka ham hardik swagat karte hain. Asha hai aage bhi isi tarah ki khubsurat kavitain padhne ko milti rahengi. Dhanyawad

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  10. Kya gazab tamacha hai yah wyawasth ke muhpar!

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  11. Tushar ji,
    sarvshree Kailash Gautam ji ki is kaaljayi rachna ko paddwaane ke liye aapka danywaad..
    asha hai aage bhi aap aisi hi rachnaayein laate rahenge..
    dhnywaad..

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  12. बिना टिकट बारात देखकर
    टाट देखकर भात देखकर
    वही ढाक के पात देखकर
    पोखर में नवजात देखकर
    पड़ी पेट पर लात देखकर
    मैं अपनी औकात देखकर

    कुछ कुछ नागार्जुन जी भी ऐसा ही लिखते थे सीधे सच्चे सरल शब्दों में गहरी बात ,,,,,,

    शुक्रिया...ये कविता पढवाने के लिए तुषार जी .....!!

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  13. शानदार प्रस्तुति के लिए बधाई.

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  14. 'सप्तरंगी प्रेम' ब्लॉग पर हम प्रेम की सघन अनुभूतियों को समेटती रचनाओं को प्रस्तुत कर रहे हैं. आपकी रचनाओं का भी हमें इंतजार है. hindi.literature@yahoo.com

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  15. हवा में उड़ता भीम देखकर
    सौ-सौ नीम हकीम देखकर

    Bahut hi badiya likha hai :)

    Regards,
    Dimple

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  16. भागो!!!
    चोट करती है कविता....

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  17. गांव गया था
    गांव से भागा
    मुठ्‌ठी में कानून देखकर
    किचकिच दोनों जून देखकर
    सिर पर चढ़ा जुनून देखकर
    गंजे को नाखून देखकर
    उजबक अफलातून देखकर
    पंडित का सैलून देखकर
    गांव गया था
    गांव से भागा।

    कैलाश जी का गीत है भाई। सारे हालात कह देता है।

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  18. bhaut bhaut dhanyavad,
    bhabhi ki chithhi gautam ji kavita khoj raha hu. 75-76 me dharmyug me chhapi thi
    " awwal number se paas karoge,
    shart rahegi kohbar ki,
    gudia jaise bahan vyaah dungi saath tumhare dever ji"
    shyam_pat@yahoo.com

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  19. vaise to kailashji ki yeh kavita kai baar parha tha. tusharji ke saujanya se ek baar phir se parh liya, chahe jitne baar parho achcha lagta hai. abhi 9-11 may tak apne gaona (rakshan, ghzaipur) mein tha. kadam-kadam par kailash ji ki yeh kavita yaad aa rahi thi.

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  20. tusharji apko bahut-bahut saadhuvaad kailashji ko yaad karne avam unki kavita sajha karne ke liye.shivach

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  21. एक परिपूर्ण व्यक्तित्व के धनी थे कैलाश जी. उनकी याद मन में लेकर कुछ लिखना आसान नहीं है. बस सोचते रहने का मन करता है. इश्वर ने उन्हें ले तो लिया पर यदि सही तरह से रख न पाए तो वापस कर दे. हमें अभी भी उनका इंतज़ार है.

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  22. Gaon gaya tha gaon se bhaga ke dwara kavi ne aaj ke gaon ke jhalak dikhlai hai. Kaash ham iski tasveer badal paate aur bhagne ki nahin apitu wahan jaker basne ki baat chal padti.

    Pradeep Mishra

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  23. kailash bhai se kai baar yah rachna sunane ka saubhagya raha kai mancho par.aaj aapney yah padhwa kar unhe shraddhanjali dee hai

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  24. गांव गया था
    गांव से भागा
    जला हुआ खलिहान देखकर
    नेता का दालान देखकर
    मुस्काता शैतान देखकर
    घिघियाता इंसान देखकर
    कहीं नहीं ईमान देखकर
    बोझ हुआ मेहमान देखकर
    गांव गया था
    गांव से भागा।



    आज का सच लिखा है आपने
    सचाई सीव्गत कराती रचना ..बहत बढ़िया ,..शुभ कामनाये

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