Wednesday, March 10, 2010

नवगीत से फिल्मी गानों को चुनौती मिलेगी


डॉ० बुद्धिनाथ मिश्र 
डॉ० बुद्धिनाथ मिश्र हिन्दी और मैथिली के नवगीतकार व कवि हैं। 'जाल फेंक रे मछेरे' 'नोहर के नाहर' (जीवनी) 'जाड़े में पहाड ' और 'शिखरिणी' उनके अब तक प्रकाशित महत्वपूर्ण नवगीत संग्रह हैं। 'आज' के सम्पादक साहित्य पद (१९७१ से ८०) को सुशोभित करने के बाद विभिन्न सरकारी उपक्रमों में राजभाषा अधिकारी के पद पर आसीन रहे। वर्तमान में वे मुख्य राजभाषा प्रबंधक तेल और प्राकृतिक गैस आयोग देहरादून के पद से सेवा-निवृत्त हो चुके हैं। डॉ० बुद्धिनाथ मिश्र से नवगीत के विविध संदर्भों पर बातचीत की है जयकृष्ण राय तुषार ने...

प्रश्न - बुद्धिनाथ जी हिन्दी गीत से नवगीत तक का सफर आपने किस प्रकार तय किया?

उत्तर - मैंने जब हिन्दी में गीत लिखना शुरू किया (१९६९), उस समय तक हिन्दी गीत ने नवगीत का आवरण ओढ़ लिया था। दोनों में स्पष्ट अन्तर दिखने लगा था। संगम (इलाहाबाद) में गंगा और जमुना के जल की तरह। उससे पहले मैं हिन्दी कविता में हिन्दी साहित्य का एक सामान्य पाठक था। मेरी शिक्षा या तो संस्कृत में हुई या अंग्रेजी साहित्य में। खडी बोली में मैं मुखयतः मैथिलीशरण गुप्त, प्रसाद, पंत, दिनकर और बच्चनजी को पढ  चुका था। नवगीतकारों के बारे में मुझे कोई जानकारी नहीं थी। काशी के मंच पर प्रथम बार जिस गीत को लेकर मेरा पदार्पण हुआ था वह था 'नाज गुजरिया नाच' यह कहीं से भी नवगीत नहीं है बल्कि स्वाभाविक उद्‌वेग से निकला हुआ एक गीत था। डॉ० शम्भुनाथ सिंह ने मुझे टोका और नवगीत के बारे में छोटी-मोटी जानकारी दी और मॉडल के रूप में अपना गीत आसमान बाहों में भर लो एक और अनहोनी कर लो मुझे दिया। इसके बाद मुझे अपने गीत और उनके गीतों में अन्तर दिखने लगा। उसके बाद मेंने नवगीत के पुराने संकलनों को खंगालना शुरू किया। राजेन्द्र प्रसाद सिंह की बहन का विवाह मेरे गांव (देवन्धा दरभंगा) में हुआ था। इसलिए उनकी सारी किताबें उनकी बहन से ही पढ ने को मिलीं। मैंने अनुभव किया कि नवगीत संग्रह में उस समय कुछ किताबें भले ही चर्चित हों लेकिन उन तत्तवों का नितांत अभाव था जो १९७० तक विकसित हुए थे। इसलिए मैंने मुक्तछंद के संकलनों को पढ ना शुरू किया उनमें मुझे कुछ नवगीत के तत्व मिले जिनका मैंने अपने गीतों में उपयोग किया रचना करते समय ये मैंने कभी नहीं सोचा कि मैं नवगीत लिख रहा हू या गीत को देशकाल-पात्र के अनुसार मैंने अभिव्यक्ति देने का प्रयास किया है।

प्रश्न- हिन्दी गीत को किन परिस्थितियों में नवगीत का आवरण ओढ़ना पडा तथा इसकी क्या विशेषताएं हैं?

उत्तर- छायावादी गीत संस्कृत श्लोकों की शब्दावली व विषयों को लेकर लिखे जाते थे। मैंने सुना है कि उनसे अपने को अलग करने के लिए गीतकारों ने फार्म और कंटेन्ट दोनों दृष्टियों से नयापन लाने के लिए नवगीत का विकास किया। यह गीत का ही आधुनिक और परिमार्जित रूप है जिसमें शब्दावली से लेकर भावों और विचारों तक में समकालीनता और आधुनिकता को अपेक्षित स्थान मिला है। आज के दौर में नवगीत का अस्तित्व इसलिए सुरक्षित है क्योंकि वह समकालीन चेतना और अभिव्यक्ति को साथ-साथ लेकर चल रहा है। मुझे लगता है कि जब कविता के लिए छन्द की अनिवार्यता फिर से अनुभव की जाने लगेगी तब नवगीत और हिन्दी गजल का स्वर हिन्दी कविता की मुखय धारा बन जायेगा।

प्रश्न- किन-किन हिन्दी नवगीतकारों की रचनाएं आपको प्रभावित करती हैं?

उत्तर - हिन्दी नवगीतकारों की एक बात मुझे अधिक अच्छी लगी कि अलग-अलग नवगीतकारों के नवगीतों का स्वरूप भी अलग-अलग है। डॉ० शम्भुनाथ सिंह, उमाकांत मालवीय, माहेश्वर तिवारी, कैलाश गौतम, शांति सुमन, शिवबहादुर सिंह भदौरिया, रमेश रंजक और वीरेन्द्र मिश्र ने अपने-अपने ढंग से नवगीत की सर्जना की है किसी ने किसी की नकल नहीं की है। ठाकुर प्रसाद सिंह के गीत जो 'वंशी और मादल' में संकलित हैं उनमें संथाल परगना के पर्वतीय जीवन के ऐसे तमाम चित्र हैं जो खडी बोली कविता में प्रथम बार आये हैं। मगर उन गीतों में छंद का निर्वाह कितना हुआ है इसकी फिर से समीक्षा होनी चाहिए।

प्रश्न- क्या आंचलिकता की ओस में भीगा गीत हमारे मन को अधिक गहरी अनुभूतियों से भर देता है? माहेश्वर तिवारी, कैलाश गौतम, गुलाब सिंह और डॉ० शिव बहादुर सिंह भदौरिया के गीतों में आंचलिकता सहज रूप से रची बसी है। गीतों में तुकान्त का क्या महत्व है?

उत्तर- इसके गुण भी हैं और दोष भी हें। आंचलिक शब्द रचना को जीवंत बना देते हैं। लेकिन उसकी ग्राह्‌यता को सीमित भी करते हैं। उदाहरण के लिए भोजपुरी क्षेत्र के शब्दों के प्रयोग से उ०प्र० और बिहार के लोग भली भांति परिचित हैं। लेकिन अन्य प्रान्तों के लोग उसे समझ नहीं पाएंगे। इसलिए मैंने अपने गीत संकलन शिखरिणी में पाठकों की सुविधा के लिए आंचलिक शब्दों का अर्थ भी दे दिया है। जहां तक तुकांत की आवश्यकता का प्रश्न है हमारे सामने विरासत में तमाम ऐसे पद और गीत हैं जिनमें तुकांत की पूरी उपेक्षा की गयी है। तुकान्त यदि स्वाभाविक रूप से आता है तब तो सोने में सुगन्ध का कार्य करता है लेकिन यदि जबरदस्ती उसका प्रयोग किया जाता है तो वह रसाभास पैदा करने लगता है इसलिए मैं तो यह कहूंगा कि रचनाकार स्वयं देखें कि तुकांत के प्रयोग से कविता का मूल स्वरूप या प्रयोजन विकृत तो नहीं हो गया है।

प्रश्न- जो कंटेन्ट आज मुक्त छंद कविता के या गद्य कविता के हैं वही कंटेन्ट आज नवगीतों में भी है। फिर नवगीत और नवगीतकारों की उपेक्षा क्यों?

उत्तर- बाजारवाद के इस दौर में जब विज्ञापन के माध्यम से झूठ प्रसारित किया जाता है तब वानस्पतिक घी की तुलना में देशी घी का पिछड़ना स्वाभाविक है क्योंकि वह अपने गुणों का प्रचार नहीं कर पाता। जब बाजार में किसी वस्तु की बिक्री खूबसूरत पैकिंग और चमकते ब्रांड नेम के आधार पर हो तब साहित्य में छंद मुक्त कविता का आगे बढ ना स्वाभाविक ही है। क्योंकि छंद मुक्त कविता की रचना नहीं बल्कि उसका उत्पादन होता है।

प्रश्न- हिन्दी नवगीत के विकास के लिए जो प्रयास डॉ० शम्भुनाथ सिंह द्वारा किया गया वैसा प्रयास आज क्यों नहीं हो रहा है? नवगीत की विकास यात्रा में नवगीत दशक और पांच जोड़ बांसुरी का क्या महत्व है?

उत्तर- मुझे लगता है कि डॉ० शम्भुनाथ सिंह जैसा सक्रिय व्यक्तित्व नवगीतकारों के समुदाय में दूसरा कोई नहीं है। कैलाश गौतम इस दृष्टि से उभरकर आ रहे थे। गत १४ नवंबर २००६ को लखनऊ में कैलाश गौतम, मोहेश्वर तिवारी के साथ मेरी बैठक में यह तय भी हुआ था कि 'पांच जोड  बांसुरी', जिसका प्रकाशन लगभग ५० वर्ष पूर्व हुआ था, इन ५० वर्षों में नवगीत ने बडी लंबी यात्रा तय की है उसे समुचित सम्मान देने की आवश्यकता है। नवगीत दशक में इस दृष्टि से हम तीनों ने भारतीय ज्ञानपीठ के निदेशक रवीन्द्र कालिया से 'पांच जोड  बासुरी' के बाद के नवगीतों का संग्रह निकालने का आग्रह किया और उसी दिन हम लोगों ने उस संकलन के प्रस्तावित नवगीतकारों की सूची भी तैयार कर ली थी। कैलाश गौतम उसे शीघ्रता से प्रकाशित कराना चाहते थे। यह हमारा दुर्भाग्य है कि वह अब उस संकलन को नहीं देख पायेंगे। जहां तक नवगीत दशक की बात है उसके माध्यम से बडे जोरदार ढंग से नवगीत के पक्ष को हिन्दी जगत के समक्ष प्रस्तुत किया गया। आज जो पत्र-पत्रिकाओं में सम्मान के साथ नवगीत को छापा जा रहा है उसमें नवगीत दशक की विशेष भूमिका है। वीरेन्द्र मिश्र, कैलाश गौतम और रमेश रंजक की उपेक्षा कर नवगीत कभी अपने पांव मजबूत नहीं कर सकता।

प्रश्न- जैसा कि नई कविता ;छन्द मुक्तद्ध को प्रचारित किया गया, उस पर गद्य में भी बहुत कुछ लिखा गया आज नवगीतों में उस तरह के गद्य का अभाव है। क्या कारण है?

उत्तर- हमारा दौर इलेक्ट्रानिक मीडिया का दौर है। हमारे समीक्षक अभी भी किताबों की समीक्षा की सामर्थ्य रखते हैं। दरअसल नवगीत की विशेषता ही सांप बनकर उसके गले पड़ गयी है। अपने गीतों के वैशिष्ट्‌य पर रीझने वाले नवगीतकार जिस आसानी से दूसरे के नवगीतों का उपहास करते हैं वह नई कविता के कवियों में आप नहीं पायेंगे। मुंडे-मुंडे मर्तिभिन्न और आत्मश्लाघा के कुछ हद तक शिकार नवगीतकार स्वभावतः अपने से बड़ी रेखा देखना नहीं चाहते हैं। दुर्भाग्य से नवगीत में आये बिम्बों, प्रतीकों और विशिष्ट शब्दों को समझने के लिए प्रारंभिक चरण में जिस प्रकार के टीकाकारों की आवश्यकता थी वह इसे नहीं मिली। इसलिए जो गीतकार काव्य मंचों पर आये उनके नवगीत तो चर्चित हुए। लेकिन किताबों और पत्र-पत्रिकाओं में अपने नवगीतों को स्थान दिला कर निश्चिंत हो जाने वाले नवगीतकार समुचित स्थान नहीं पा सके। मुझे नहीं लगता कि मुक्त छंद के कवियों की तरह नवगीतकार कभी एक दूसरे की प्रशंसा कर पायेंगे। क्योंकि दूसरे की प्रशंसा करने में उन्हें अपने पिछड ने का डर परेशान करने लगता है।

प्रश्न- आज फिर से पत्र-पत्रिकाओं में गीतों की वापसी हुई है। किन्तु नये कवि नवगीत की तरह या तो आ ही नहीं रहे हैं या कम आकर्षित हैं। आने वाले दिनों में नवगीत की क्या शक्ल होगी?

उत्तर- नवगीत की रचना के लिए जो समर्पित साधना, व्यापक अनुभूति और जीवन के आसपास की चीजों को परखने का नजरिया चाहिए उसका अभावा नई पीढ़ी में दिखाई पड ता है। दूसरी बात, आज का समाज जिस तरह से पूर्णतः भौतिकवादी हो गया है। उसमें कोई व्यक्ति केवल नवगीत लिखकर समाज में जी भी नहीं सकता है। हास्य कवियों की तादाद बढी है। एक नवगीत लिखने में कभी-कभी १५ दिन भी लग जाते हैं। जबकि मुक्त छंद की कविता एक दिन में १५ लिखी जा सकती है। छन्दमुक्त कविता में कविता और अकविता का भेद समाप्त कर दिया है। जब कोई साहब अपने गद्य को कविता घोषित करते हैं तब वह कविता नहीं है, इसे प्रमाणित करने के लिए हमारे पास कोई प्रतिमान नहीं है। इसलिए छन्द मुक्त कविता से 'अहो रूपं अहोध्वनि' की प्रवृत्ति को ज्यादा बढावा दिया है। आने वाला युग इलेक्ट्रानिक युग होगा जिसमें किताबों का महत्व घटेगा इसलिए नवगीतकारों को अपनी रचनाओं को सीडी, इंटरनेट जैसे आधुनिक माध्यमों के द्वारा समाज तक पहुंचाने का प्रयास करना चाहिए। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि भक्त कवियों के पदों को सदियों तक समाज में जीवंत सुरक्षित रखने में संगीतज्ञयों की काफी अहम भूमिका रही है। संगीतबद्ध नवगीतों के समाज में आने से हल्के फुल्के फिल्मी गानों को चुनौती मिलेगी।

(यह साक्षात्कार अक्षर पर्व पत्रिका के फरवरी २००७ अंक में प्रकाशित हो चुका है।)

18 Comments:

madhushuklaji said...

tushar, interview padh liya hai, kaafi jaankariyan mili, iske liye aapko aur buddhinath ji ko dhanyawaad aur shubhkaamnayen.

अजय कुमार said...

हिंदी ब्लाग लेखन के लिए स्वागत और बधाई
कृपया अन्य ब्लॉगों को भी पढें और अपनी बहुमूल्य टिप्पणियां देनें का कष्ट करें

kshama said...

Bahut achha sakshatkar!

shama said...

Swagat hai...achhee jaankaaree mili!

कविता वाचक्नवी Kavita Vachaknavee said...

ओ.एन जी.सी. से अब लगभग वर्ष भर पूर्व वे रिटायर हो चुके हैं; सो, कृपया जानकारी अद्यतन कर लें।

rajneeshalld said...

Interview is too much excellent.

प्रदीप कांत said...

बहुत ही अच्छा साक्षात्कार।

amit said...

Wakai, yah interview kabile taarif hai, badhai aur shubhkamnaye........

Amit Kumar said...

सुन्दर प्रस्तुति....बधाई !!
______________
सामुदायिक ब्लॉग "ताका-झांकी" (http://tak-jhank.blogspot.com)पर आपका स्वागत है. आप भी इस पर लिख सकते हैं.

Ram Shiv Murti Yadav said...

सारगर्भित साक्षात्कार...जानकारी भरी पोस्ट, बधाई.

DEO DAYAL said...

very nice

जयराम “विप्लव” { jayram"viplav" } said...

कली बेंच देगें चमन बेंच देगें,

धरा बेंच देगें गगन बेंच देगें,

कलम के पुजारी अगर सो गये तो

ये धन के पुजारी वतन बेंच देगें।

हिंदी चिट्ठाकारी की सरस और रहस्यमई दुनिया में राज-समाज और जन की आवाज "जनोक्ति "आपके इस सुन्दर चिट्ठे का स्वागत करता है . . चिट्ठे की सार्थकता को बनाये रखें . नीचे लिंक दिए गये हैं . http://www.janokti.com/ , साथ हीं जनोक्ति द्वारा संचालित एग्रीगेटर " ब्लॉग समाचार " http://janokti.feedcluster.com/ से भी अपने ब्लॉग को अवश्य जोड़ें .

ghaziimtiaz said...

ghazi said
tushar bhai apne bahut achcha iterview liya. bduinath chacha kai mahatwapyrna jankari di hai.
imtiaz ghazi

shashank said...

Excellent!!

snigdha said...

tushar bhai apne bahut mahatwapurn jankarian di hain dr budhinath mishr ke kavita lekan aor sahityA ke vishay me.apke dwara kiye gaye is mahatwa purna karya se sahitya ko age badne me kafi sahiyog milega

RAGINICHATURVEDI

संगीता पुरी said...

इस नए चिट्ठे के साथ हिंदी ब्‍लॉग जगत में आपका स्‍वागत है .. नियमित लेखन के लिए शुभकामनाएं !!

Anonymous said...

बहुत ही सटीक अभिव्यक्ति . परम आदरणीय डॉ बुद्धिनाथ मिश्राजी के प्रश्नोत्तर मन को छू जाते हैं. गीत-नवगीत के प्रासंगिक बिन्दुओं पर चर्चा हुई है. मेरी बधाई स्वीकारें.
Abnish Singh Chauhan
Etawah, UP.

Anonymous said...

बहुत ही सटीक अभिव्यक्ति . परम आदरणीय डॉ बुद्धिनाथ मिश्राजी के प्रश्नोत्तर मन को छू जाते हैं. गीत-नवगीत के प्रासंगिक बिन्दुओं पर चर्चा हुई है. मेरी बधाई स्वीकारें.
Abnish Singh Chauhan
Etawah, UP.